मन गुर गुर जप रे ।इहो तेरो तप रे।।
आद तू ही अंत तू ही । मध्य तू ही, बेअंत तू ही।
सतियों का सत्त रे । मन गुर गुर जप रे ।।
ब्रह्मा तू ही विष्णु तू ही । राम तू ही कृष्ण तू ही।
द्रोपदी की पत् रे । मन गुर गुर जप रे।।
एक तू ही अनेक तू ही । सर्व तू विवेक तू ही।।
महिमा कह अकथ रे । मन गुर गुर जप रे।।
इत तू ही उत् तू ही । जल तू ही थल तू ही।
हर जाह समरथ रे। मन गुर गुर जप रे।।
मंड तू ब्रह्मण्ड तू ही । अकाल तू अखंड तू ।।
आशिको का मत रे । मन गुर गुर जप रे।।
आकार तू ओंकार तू ही । मकार तू ही साकार तू ही।
वेदों का तथ रे । मन गुर गुर जप रे।।
बातन तू ही जाहीर तू ही। आशक तू ही माहिर तू ही।
हाथ तेरे गत रे । मन गुर गुर जप रे।।
पीर तू ही फ़क़ीर तू ही । गोदड़ी कि धीर तू ही।।
बख्श अपनी सुमत रे । मन गुर गुर जप रे।।