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गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥

(हे भाई ! विकारों से मुकाबले में) पूरे गुरू ने मेरी इज्जत रख ली है।

अंमृत नामु रिदे महि दीनो जनम जनम की मैलु गई ॥

गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल हरी-नाम मेरे हृदय में बसा दिया है। (उस नाम की बरकति से) अनेकों जन्मों के किए कर्मों की मैल मेरे मन में से दूर हो गई है।

निवरे दूत दुसट बैराई गुर पूरे का जपिआ जापु ॥

हे भाई ! पूरे गुरू का बताया हुआ हरी-नाम का जाप जब से मैंने जपना शुरू किया है। (कामादिक) सारे वैरी दुर्जन भाग गए हैं।

 

कहा करै कोई बेचारा प्रभ मेरे का बड परतापु ॥

मेरे प्रभू की बड़ी ताकत है। अब (इनमें से) कोई भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता।


सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ चरन कमल रखु मन माही ॥

(हे भाई ! गुरू की किरपा से परमात्मा के सोहणे चरण) मेरे मन में आसरा बन गए हैं। उसका नाम (हर वक्त) सिमर-सिमर के मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त किया है।

ता की सरनि परिओ नानक दासु जा ते ऊपरि को नाही ॥

हे भाई ! (प्रभू का) दास नानक उस (प्रभू) की शरण पड़ गया है जिससे बड़ा और कोई नहीं।