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सूही महला ४ घरु ७

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

 

तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥

तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूँ ठाकुर ऊच भगवाना ॥१॥

 

तू सारे गुणों का खजाना है।तू सबको पालने वाला है।मैं तेरे कौन-कौन से गुण बता के तेरी सिफत-सालाह कर सकता हूँ।

हे सबसे ऊँचे भगवान ! तू सबका मालिक है।मैं तेरी महिमा बयान नहीं कर सकता। 1।

 

मै हरि हरि नामु धर सोई ॥

जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥१॥ रहाउ ॥

 

हे हरी ! मेरे वास्ते तेरा वह नाम ही सहारा है।

हे मेरे मालिक ! जैसे तुझे अच्छा लगे वैसे मेरी रक्षा कर तेरे बिना मेरा और कोई (सहारा) नहीं है। 1।रहाउ।

 

मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥

मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥२॥

 

हे मेरे मालिक ! तू ही मेरे वास्ते बल है।तू ही मेरे वास्ते आसरा है।मैं तेरे आगे ही आरजू कर सकता हूँ।

मेरे लिए कोई और ऐसी जगह नहीं।जिसके पास मैं विनती कर सकूँ।मैं अपना हरेक सुख हरेक दुख तेरे सामने ही रख सकता हूँ। 2।

 

विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥

बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥३॥

हे मेरे मन ! देख।(पानी के) बीच में ही धरती है।(धरती के) बीच में ही पानी है।लकड़ी में आग रखी हुई है।

(मालिक प्रभू ने।मानो) शेर और बकरी एक ही जगह रखे हुए हैं।हे मन ! (तू डरता क्यों है।ऐसी शक्ति वाले) परमात्मा का नाम जप के तू अपना हरेक डर-भ्रम दूर कर लिया कर। 3।

 

हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥

जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥४॥१॥१२॥

 

 

हे संत जनो ! देखो परमात्मा की बड़ी ताकत ! परमात्मा उनको आदर दिलवाता है।जिनकी कोई इज्जत नहीं करता था।

हे नानक ! जैसे धरती (मनुष्य के) पैरों के नीचे से (मौत आने से उसके) ऊपर आ जाती है।वैसे ही परमात्मा सारे जगत को ला के साध-जनों के चरणों में डाल देता है। 4। 1। 12।