हे मेरे मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य के सिर पर तू (हाथ रखे) उसे कोई दुख नहीं व्यापता।
वह मनुष्य माया के नशे में मस्त हो के तो बोलना ही नहीं जानता।मौत का
सहिम भी उसके चिक्त में पैदा नहीं होता। 1।
हे मेरे प्रभू पातशाह ! तू (अपने) संतो का (रखवाला) है।(तेरे) संत तेरे (आसरे रहते हैं)।
हे प्रभू ! तेरे सेवक को कोई डर छू नहीं सकता।मौत का डर उसके नजदीक नहीं फटकता। 1।रहाउ।
हे मेरे मालिक ! जो मनुष्य तेरे प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।उनके पैदा होने-मरने (के चक्रों) के दुख दूर हो जाते हैं।
उन्हें गुरू द्वारा (दिया हुआ ये) भरोसा (हमेशा याद रहता है कि उनके ऊपर हुई) तेरी कृपा को कोई मिटा नहीं सकता। 2।
हे प्रभू ! (तेरे संत तेरा) नाम सिमरते रहते हैं।आत्मिक आनंद भोगते रहते हैं।आठों पहर तेरी आराधना करते हैं।
तेरी शरण में आ के।तेरे आसरे रह के वह (कामादिक) पाँचों वैरियों को पकड़ कर बस में कर लेते हैं। 3।
हे मेरे मालिक प्रभू ! मैं (भी) तेरी (कृपा की) कद्र नहीं था जानता।मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं थी।तेरे चरणों में सुरति टिकानी भी नहीं जानता था।किसी अन्य धार्मिक कर्म की भी मुझे सूझ नहीं थी।
पर (तेरी मेहर से) मुझे सबसे बड़ा गुरू नानक मिल गया।जिसने मेरी लाज रख ली (और मुझे तेरे चरणों में जोड़ दिया)। 4। 10। 57।