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सूही महला ५ ॥

 

जिस के सिर ऊपरि तूँ सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥

हे मेरे मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य के सिर पर तू (हाथ रखे) उसे कोई दुख नहीं व्यापता।

बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥१॥

वह मनुष्य माया के नशे में मस्त हो के तो बोलना ही नहीं जानता।मौत का 
सहिम भी उसके चिक्त में पैदा नहीं होता। 1।

मेरे राम राइ तूँ संता का संत तेरे ॥

हे मेरे प्रभू पातशाह ! तू (अपने) संतो का (रखवाला) है।(तेरे) संत तेरे (आसरे रहते हैं)।

तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

हे प्रभू ! तेरे सेवक को कोई डर छू नहीं सकता।मौत का डर उसके नजदीक नहीं फटकता। 1।रहाउ।

जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन्न का जनम मरण दुखु नासा ॥

हे मेरे मालिक ! जो मनुष्य तेरे प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।उनके पैदा होने-मरने (के चक्रों) के दुख दूर हो जाते हैं।

तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥२॥

उन्हें गुरू द्वारा (दिया हुआ ये) भरोसा (हमेशा याद रहता है कि उनके ऊपर हुई) तेरी कृपा को कोई मिटा नहीं सकता। 2।

नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥

हे प्रभू ! (तेरे संत तेरा) नाम सिमरते रहते हैं।आत्मिक आनंद भोगते रहते हैं।आठों पहर तेरी आराधना करते हैं।

तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥३॥

तेरी शरण में आ के।तेरे आसरे रह के वह (कामादिक) पाँचों वैरियों को पकड़ कर बस में कर लेते हैं। 3।

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥

हे मेरे मालिक प्रभू ! मैं (भी) तेरी (कृपा की) कद्र नहीं था जानता।मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं थी।तेरे चरणों में सुरति टिकानी भी नहीं जानता था।किसी अन्य धार्मिक कर्म की भी मुझे सूझ नहीं थी।

सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥४॥१०॥५७॥

पर (तेरी मेहर से) मुझे सबसे बड़ा गुरू नानक मिल गया।जिसने मेरी लाज रख ली (और मुझे तेरे चरणों में जोड़ दिया)। 4। 10। 57।