(हे प्रभू ! जगत में) वैसा ही होता है जैसा तेरा हुकम होता है।
जहाँ जहाँ तू खुद (जीवों को) रखता है।वहीं (जीव) जा खड़े होते हैं;
जो जीव तेरे नाम के प्यार में (रहते) हैं वह बुरी मति धो देते हैं।
हे निरंकार ! तुझे सिमर सिमर के भटकना और डर दूर कर लेते हैं।
जो मनुष्य तेरे प्यार में रंगे जाते हैं वे जूनियों में नहीं पाए जाते।
अंदर-बाहर (हर जगह) वह एक (तुझे ही) आँखों से देखते हैं।
हे नानक ! जिन्होंने प्रभू का हुकम पहचान लिया है वह कभी भी पछताते नहीं (क्योंकि वह किसी विकार में फसते नहीं।
बल्कि) प्रभू के नाम रूपी बख्शिश (सदा अपने) मन में परोए रखते हैं।