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धनासरी महला ५ ॥

चतुर दिसा कीनो बलु अपना सिर ऊपरि करु धारिओ ॥

हे भाई ! जिस प्रभू ने चारों तरफ (सारी सृष्टि में) अपनी कला फैलाई हुई है।उसने (अपने दास के) सिर पर सदा ही अपना हाथ रखा हुआ है।

कृपा कटाख्य अवलोकनु कीनो दास का दूखु बिदारिओ ॥१॥

मेहर की निगाह से अपने दास की ओर देखता है।और।उसका हरेक दुख दूर कर देता है। 1।

हरि जन राखे गुर गोविंद ॥

हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक की (हमेशा) रखवाली करता है।

कंठि लाइ अवगुण सभि मेटे दइआल पुरख बखसंद ॥ रहाउ ॥

(सेवक को अपने) गले से लगा के दया-का-घर सर्व-व्यापक बख्शनहार प्रभू उनके सारे अवगुण मिटा देता है।रहाउ।

जो मागहि ठाकुर अपुने ते सोई सोई देवै ॥

हे भाई ! प्रभू के दास अपने प्रभू से जो कुछ माँगते हैं वह वही कुछ उनको देता है।

नानक दासु मुख ते जो बोलै ईहा ऊहा सचु होवै ॥२॥१४॥४५॥

हे नानक ! (प्रभू का) सेवक जो कुछ मुँह से बोलता है।वह इस लोक में परलोक में अटल हो जाता है। 2। 14। 45।