"जय सिया राम"
कमली वाले दाता की शान ही निराली हैं,
वो दो जहाँ के दाता है, सारा जग साली हैं,
चाँद की तरह इनको, हम करें तो मुजरिम हैं,
क्योंकि इनकी चौखट पर चाँद भी सवाली हैं,
कमली ...
हम अपने गुनाहों को इन से बक्शा वाले लेगे
क्योंकि एख के अतिक इनकी पातशाही रे,
कमली ...
रोज भीख बंटती हैं, इनके दर पर रहमत की,
दामने तलब अपना, क्यों कहूँ के खाली हैं,
कमली...
महिमा अपार तेरी दुनिया हैं दर पे खड़ी,
हरते हो दुख सब के, जब -जब भीड़ है पडी,
कमली..."