लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥
अगर~ (मेरा) सतिगुरू (मेरे पे) मेहर की (एक) निगाह करे~ तो (मैं समझता हूं कि मुझे) लाखों बादशाहत की खुशियां मिल गई हैं।
क्योंकि~ जब गुरू मुझे) आँख के झपकने के जितने समय वास्ते भी परमात्मा का नाम बख्शता है~ तो मेरा मन शांत हो जाता है। मेरा शरीर शांत हो जाता है। (मेरी सारी ज्ञानेन्द्रियां विकारों की भड़काहट से हट जाती हैं)।
अगर~ एक परमात्मा मिल जाए~ तो (दुनियां के और) सारे पदार्थ मिल जाते हैं (देने वाला जो खुद ही हुआ)।
अगर मैं सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की सिफत सलाह करता रहूं~ तो ये कीमती मानस जनम सफल हो जाए।
पर~ उसी मनुष्य को) गुरू की ओर से (परमात्मा के चरणों का) निवास प्राप्त होता है जिसके माथे पर (अच्छे भाग्य) लिखे हुए हों।
हे मेरे मन ! सिर्फ एक परमात्मा के साथ सुरति जोड़।
एक परमात्मा (के प्यार) के बिनां (दुनियां की) सारी (दौड़ भाग) जंजाल बन जाती है। और माया का मोह है भी सारा व्यर्थ।
पर उसी मनुष्य ने सतिगुरू के चरण पकड़े हैं (वही मनुष्य सतिगुरू का आसरा लेता है)~ जिस को पूर्व जन्म का लिखा हुआ (अच्छा लेख) मिलता है (जिसके सौभाग्य जागते हैं)।
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥
वह समय कामयाब समझो~ वह घड़ी सौभाग्यपूर्ण जानो~ जिसमें सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्यार बने।
जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का (जिंदगी का) आसरा मिल जाता है~ उस को कोई दुख~ कोई कलेश छू नहीं सकता।
जिस मनुष्य की गुरू ने बाँह पकड़ के (विकारों में से बाहर) निकाल लिया~ वह (संसार समुंद्र में से सही सलामत) पार लांघ गए।
(ये सारी बरकत है गुरू की~ साध-संगति की) जहां साध-संगति जुड़ती है वह जगह सुंदर है पवित्र है।
साध-संगति में आ के) जिसने पूरा गुरू ढूंढ लिया है~ उसी को ही (परमात्मा की हजूरी में) आसरा मिलता है।
हे नानक ! उस मनुष्य ने अपना पक्का ठिकाना उस जगह पे बना लिया~ जहां आत्मिक मौत नहीं~ जहां जन्म मरण का चक्कर नहीं~ जहां आत्मिक जीवन कभी कमजोर नहीं होता।