अब प्यारे गुरू से) जब मुझे (तेरा) नाम मिलता है। तो मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। मेरा तन मेरा मन (उस आत्मिक जीवन की बरकति से) खिल उठता है।
हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं तेरे किए हुए उपकारों की कद्र नहीं समझ सकता। (उपकार की दाति संभालने के लिए) तूने (खुद ही) मुझे योग्य बर्तन बनाया है।
मुझ गुण-हीन में कोई गुण नहीं है। तुझे स्वयं ही मुझ पर तरस आ गया।
हे प्रभू ! तेरे मन में मेरे लिए दया पैदा हुई। मेरे पर तेरी मेहर हुई। तब मुझे मित्र गुरू मिला (तेरा यह उपकार भुलाया नहीं जा सकता)।