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ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥

वह (ही) मेरे प्यारे मित्र हैं वह (ही) मेरे सज्जन हैं।


जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥

हे भाई ! जो (संत जन) मुझे परमात्मा का नाम याद करवाते हैं ।


जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥

हे भाई ! (वह संत जन ही मेरे प्यारे मित्र हैं) जिनके दर्शनों से करोड़ों पाप उतर जाते हैं

 

भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥

(जिन के चरणों) को छूने से संसार-समुंदर से पार लांध जाया जाता है। 


जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥

हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिनके वचन सुन के सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं।


जा की टहल जमदूत बिदारे ॥

जिनकी टहल करने से जमदूत (भी) नाश हो जाते हैं।

 

जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥

हे भाई ! (वही हैं मेरे मित्र) जिन के द्वारा (दिया हुआ) धीरज (मेरे) इस मन को सहारा देता है।


जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥

जिन (के दिए हुए हरी-नाम) के सिमरन से (लोक-परलोक में) मुँह उज्जवल होता है। 


प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥

हे नानक ! प्रभू ने स्वयं ही अपने सेवकों का जीवन सुंदर बना दिया है।

सरणि नानक तिन्न सद बलिहारे ॥


हे भाई ! उन सेवकों की शरण पड़ना चाहिए।उन पर से सदा कुर्बान होना चाहिए।