पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥
हे प्रभू जी ! (तेरी मेहर से मेरी हरेक) आशा और कामना पूरी हो गई है।
मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥
हे प्रभू जी ! मैं गुणहीन था (मेरे अंदर कोई भी गुण नहीं था) तेरे अंदर सारे ही गुण हैं।
सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥
हे मेरे मालिक ! तेरे अंदर सारे ही गुण हैं।मैं किस मुंह से तेरी महिमा गाऊँ।
गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥
तूने मेरा कोई अवगुण नहीं विचारा।तूने मेरा कोई गुण नहीं देखा।और।एक पल में ही तूने मुझ पर मेहर कर दी।
नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥
(तेरी मेहर से मैंने।मानो) सारे ही नौ खजाने हासिल कर लिए हैं।मेरे अंदर आत्मिक आनंद की चढ़दीकला बन गई है मेरे अंदर आत्मिक आनंद के एक-रस बाजे बजने लगे हैं।
कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥४॥१॥
हे नानक ! (कह–) हे प्रभू जी ! मैंने (तुझे) पति को अपने हृदय-गृह में ही पा लिया है।मेरे सारे ही चिंता-फिक्र उतर गए हैं। 4। 1।