हे मित्र ! परमात्मा के नाम के गुण (इस वक्त) गा ले। परमात्मा का नाम सिमरने से ही (लोक-परलोक में) तेरी इज्जत बनी रह सकती है।
परमात्मा का नाम सिमरने से ही यमराज भी कुछ नहीं कहता।
हे मित्र ! ये घर। हे हकूमत। ये धन (इनमें से कोई भी) तेरे (आत्मिक जीवन के) किसी काम नहीं आ सकता।
मायावी पदार्थों के झमेले भी तुझे आत्मिक जीवन का लाभ नहीं दे सकते।
याद रख कि ये सारे प्यारे मित्र (तेरे वास्ते) छल रूप ही हैं।
सिर्फ परमात्मा का नाम ही तेरे साथ साथ निभा सकता है।
हे मित्र ! परमात्मा के नाम के बिना सारे काम व्यर्थ (हो जाते हैं)।
(अगर परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। तो) सोना। चाँदी। रुपया-पैसे (तेरे वास्ते) मिट्टी (के समान) है।
हे मित्र ! गुरू का शबद याद करता रहा कर। तेरे मन को आनंद मिलेगा।
इस लोक में और परलोक में तू सुर्खरू होगा।
हे मित्र ! तेरे से पहले हो चुके सभी लोग माया के धंधे कर-कर के थकते रहे।
किसी ने भी ये धंधे सिरे नहीं चढ़ाए (किसी की भी तृष्णा खत्म नहीं हुई)
जो कोई विरला मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है।
उसकी आशा पूरी हो जाती है (उसकी तृष्णा खत्म हो जाती है)।
हे मित्र ! परमात्मा के भक्तों के लिए परमात्मा का नाम ही जीवन का आसरा होता है।
तभी तो संत जनों ने ही अमूल्य मानस जनम की बाजी जीती है।
परमात्मा का संत जो कुछ करता है। वह (परमात्मा की नजरों में) कबूल होता है।
हे नानक ! (कह- मैं) दास उससे बलिहार जाता हॅू।