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राम नाम गुण गाइ ले मीता हरि सिमरत तेरी लाज रहै ॥
हरि सिमरत जमु कछु न कहै ॥

हे मित्र ! परमात्मा के नाम के गुण (इस वक्त) गा ले। परमात्मा का नाम सिमरने से ही (लोक-परलोक में) तेरी इज्जत बनी रह सकती है।
परमात्मा का नाम सिमरने से ही यमराज भी कुछ नहीं कहता।


तेरै काजि न गृहु राजु मालु ॥
तेरै काजि न बिखै जंजालु ॥

हे मित्र ! ये घर। हे हकूमत। ये धन (इनमें से कोई भी) तेरे (आत्मिक जीवन के) किसी काम नहीं आ सकता।
मायावी पदार्थों के झमेले भी तुझे आत्मिक जीवन का लाभ नहीं दे सकते।

इसट मीत जाणु सभ छलै ॥
हरि हरि नामु संगि तेरै चलै ॥

याद रख कि ये सारे प्यारे मित्र (तेरे वास्ते) छल रूप ही हैं।
सिर्फ परमात्मा का नाम ही तेरे साथ साथ निभा सकता है।


बिनु हरि सगल निरारथ काम ॥
सुइना रुपा माटी दाम ॥

हे मित्र ! परमात्मा के नाम के बिना सारे काम व्यर्थ (हो जाते हैं)।
(अगर परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। तो) सोना। चाँदी। रुपया-पैसे (तेरे वास्ते) मिट्टी (के समान) है।

 

 

गुर का सबदु जापि मन सुखा ॥
ईहा ऊहा तेरो ऊजल मुखा ॥

हे मित्र ! गुरू का शबद याद करता रहा कर। तेरे मन को आनंद मिलेगा।
इस लोक में और परलोक में तू सुर्खरू होगा। 

करि करि थाके वडे वडेरे ॥
किन ही न कीए काज माइआ पूरे ॥

हे मित्र ! तेरे से पहले हो चुके सभी लोग माया के धंधे कर-कर के थकते रहे।
किसी ने भी ये धंधे सिरे नहीं चढ़ाए (किसी की भी तृष्णा खत्म नहीं हुई)

हरि हरि नामु जपै जनु कोइ ॥
ता की आसा पूरन होइ ॥

जो कोई विरला मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है।
उसकी आशा पूरी हो जाती है (उसकी तृष्णा खत्म हो जाती है)। 

हरि भगतन को नामु अधारु ॥
संती जीता जनमु अपारु ॥

हे मित्र ! परमात्मा के भक्तों के लिए परमात्मा का नाम ही जीवन का आसरा होता है।
तभी तो संत जनों ने ही अमूल्य मानस जनम की बाजी जीती है।


हरि संतु करे सोई परवाणु ॥
नानक दासु ता कै कुरबाणु ॥


परमात्मा का संत जो कुछ करता है। वह (परमात्मा की नजरों में) कबूल होता है।
हे नानक ! (कह- मैं) दास उससे बलिहार जाता हॅू।