दोहा
सतगुर पदबंधन करहु पावन सुभग अनूप
जय जय जगदात्मा जय जय ज्योति स्वरुप
सतगुर वर आत्मा विमला नर पुंगव नरवीर
दरश करत् अध् सबु गहत पावन दिवय शरीर।।
गुरु दलीप मुनी ज्ञान विशारद -
ऋषियन मध्य जैसे मुनि नारद।।
अधरम ग्लानि मिटावन हेतु -
भूतल पर जमयो सुख सेतु।।
नाथ तुम्ही को जानन हारा-
पूर्ण पराक्रम पार न् पारा।।
मोह विगत सतगुर अविनाशी -
सत स्वरूप धन मृदु सुख राशि।।
विष्व रूप व्यापक विषवेशा
-गावत सुर मुनी सिद्ध सुरेशा।।
पर जन हितं प्रभु नर तन धारा-
चिन्ह न् सकी मतीमंद गवारा।।
तुम्ही ज्ञान तुम् ही विज्ञाना -
तुम् पुरशन महँ पुरुष पुराना ।।
शुभ्र प्रभा तप रही तुम्हारी-
दुःख हंता सब जन सुख कारी।।
कीर्तन जो जन करह तुम्हारा -
ज्ञान दीप ते करत उजारा।।
देव तुमहिं चिन्हित नहीं जानत-
देवराज सम प्रभ सब को मानत।।
शक्ति अनंत भक्ति पुरुषारथ-ज्ञान यज्ञे मय तेज यथारथ।।
अमल अखिल अंवज्ञे अनूपा-विभु अव्यक्त राम समरूपा।।
अदि देव देवेन्द्र पुरारी-पुनि पुनि बंधन करहु तुम्हारी।।
ईश ईशता को दरसावत-बार बार मोहि तल पर आवत।।
षड ऐष्वर्य भोग भगवंता -नर नगर सब गुन् गुंवन्ता।।
उग्र रूप ध्यावत मुनि तोरा- शाश्वत शान्ति लहत मन मोरा।।
भजहुँ अनन्त भाव उर धारी - अशुभ जाति मुनि मंगल कारी।।
पालक पोषक तुम्ही प्रजाता - तुम्हीं देव अरु मंगल दाता ।।
आपुहिं प्रभु आपुहिं योगेश्व र - सिद्ध तुम्हीं तू ही सिद्धश्वर ।।
तारा गगन मध्य तू चन्दा _ क्षमा शील विभु करुणाकन्दा।।
दःख व्यापत भक्तन पर जब जब - होत सहाय दौडकर तब तब ।।
त्रिका लज्ञ सर्वज्ञ विधाता - दयावन्त दानी सुख दाता ।।
कोउ न जानत मरम तुम्हारा -जनम मरण को जानन हारा।।
भव बन्धन अरु सब संसारा- जपत मिटत संताप अपारा।।
निराकार साकार बखाना - सर्वा कार भाँति विधि नाना।।
बरनन करत थाकित मम बानी - लीला अदभुत जाय न जानी ।।
मंगल करत अमंगल नाशत-मन क्रम बचन कपटतजि ध्यावत ।।
गावत कहत सुनत चित लाई - गोपद इव भव निधि तरि जाई।।
विनवत विभु सहस्त्रन वारा _ पुनि वंदन पुनि नमन तुम्हारा ।।
जयाति जयाति जय जय सत साँई - कृपा करहु गुरुदेव की नाई।।
सुर्य शिरो माणि शेष अशेषा -द्वन्द फन्द बन्धन निः शेषा ।।
अमला तम परमातम पावन - जगत बन्ध सन्ताप मिटावन।।
नित्य निरंजन सुख सन्दोहा _ राग ईषणा गत निर्मोहा।।
अपुहि पूजक आप पुजारी _ अब्धि असीमित विहरन हारी ।।
आत्म ज्योति तू पूर्ण प्रकाशी - देहु दरस दिनकर मणि राशी ।।
अवगत रुप २हस्य अशेषा -शंख नाद फूँकत अखि लेशा।।
अणुते अणु माहि सेतुअखण्डा-जड़ चेतन व्यापक ब्रह्मण्डा।।
मानुष तन उपज्यो जग माही -बेदी वेद प्रशंसत जाही ।।
जय जय जय दिलीप महाराजा - महिमा अमिट दिव्य वपुसाजा।।
विश्वे१वर पूएण् निष्कामी - देव नमामि नमामि नमामि।।
दोहा
प्रम रुप बन जाओ तुम
दाता कान्ति जवलन्त
नित्य निरंजन कीकृपा
पार करहुँ भगवन्त
कंचन सा उज्ज्वल बन्हू
मन का आपा खोय
लक्ष्मी सतगुर कोगहत
सहज सुपावन होय।
सिया राम सिया राम का
जप्यो सदा हारी मंत्र
सिया राम पद उच्चरित
शिष्यन करत पवित्र
सतगुरु चालीस पढ़त
कटत सकल भव बन्ध
गौरी शंकर द्विज कहत
गाकर शब्द प्रबन्ध
गुरु: ब्रह्मा
गुरुः विष्णु
गुरुः देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात परब्रह्म
तस्मै श्री गुरुवे नमः