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पवनतनय में आगया - पवन समान प्रवाह ।
जामवन्तके वचन ने - बढा दिया उत्साह ।
ऋक्षराज से उसी क्षण, बोल उठे कपिराज
"'बल प्रभ् से पाया " - मिली बुद्ध आपसे-आज ।।


मैं जब तक लौट नहीं आऊ, तबतलक यहीं ठहरे रहना
श्रीराम-नाम का कीर्तन कर - आशिष मुझको देते रहना ।।
उठ रही उमंग हृदय से है - उत्साह बढ़ रहा है तन में।
निश्चय ही कार्य सिद्ध होगा, यह कहता है कोई मन में ।।
इतने 'ही में मछली देखी, श्यामा बोली दायें करको ।
यह शकुन देख-अंजनीलाल, गरजे फिर उछले ऊपर को ।
हृदय स्थलवाले राघव का, मन ही मन -सादर ध्यान किया
बादल की नार्ड गर्जन कर लकापुर को प्रस्थान किया 
सागर में उठा ज्वारभाटा-शैलों से प्रकटी ज्वाला है ।
कच्छप वराह भौचक्के थे, क्या है ? क्या होने वाला है।।
जिस पर्वत 'पर पड जाय पाव-वह तले धसकता जाता धाा।
मारूत-समान मारुतनन्दन-यों आगे बढ़ता जाता था।।

''महाबली तब बली है, जब हो बद्धिनिधान ।'
सोच रहे थे देवता- "ऐसे हैं हनुमान ?"
"लंका जाने के प्रथम -हो जाए यह ज्ञात
इसी परीक्षा ' के लिए - भेजी सुरसा मात।।
राह रोक बजरंग की - बोली वह ललकार।
"'आज मिला है भाग्य 'से -पूरा मुझे आहार t
पवनतनय कहने लगे 'राह छोड 'दे मात -
धीरज धारकर हृदय से सुनले मेरी बात ।।


आवश्यक सेवा सम्मुख है, उसको ही प्रथम करूँगा ें।
अवकाश मिलेगा जब उससे तब तेरी भूख हरुगा मेैं t


सुरसा बोली - बकवाद छोड़, मनचीता अभी करँगी मैं।l
मुझको यह परमावश्यक है निज मुख में तुझे धरूँगी मैं।
हनुमत् ने फिर भी समझाया - पर, सहमत नहीं हुईं सुरसा -
तब तो वह विक्रम, बजरंगी - हो गया तनिक क्रोधातुर- सा।।
कह दिया -""यही इच्छा है तो - जो करना है झटपट करले।
ऐसी ही हठ है, हे माता, तो मुख ही में मुझको धरले ।।'"
पवनतनय के वचन सुन सुरसा हई विशाल -
योजनभर का मुख किया गरज उठी तत्काल।।
अबला के अभिमान पर - हँसे तनिक हनुमन्त
दो योजन का कर दिया - अपना बदन तुरंत !
अब हो गयी होड़ सी कुछ, वह चार हुईं यह आठ हुए।
वह पंद्रह तो यह तीस हुए वह तीस हईं- यह साठ हुए ।
सौ योजन का मुख कर डाला - जब उस सर्पों की जननी ने ।
उस समय बुद्धि से काम किया - श्रीमहावीर बजरंगी ने ।l

छोटा सा रूप बना अपना, उसकी जिव्हा पर जा पहचे -
क्षण भर उस जगह बैठकर, फिर बाहर तुरन्त ही आ पहुंचे।
बोले - ले मुख में हो आया, तेरा ही ' कहा किया माता

यही 'मांगती थी 'मुझसे, तो मैंने यही दिया माता।

 

अब सुरसा 'सुरसा' बनी बोली कर मृदुहास -
''मेरा गुस्सा वह बना - रवि था जिनका ग्रास।।
उधर शुभाशीर्वाद 'दे - उसने किया पयान ।
इधर सुमिर ' नरसिंह को, चले सिंह हनुमान ।।


इन्द्रादिक मंगल ' मना मना, नभ से प्रसून बरसाते थे।
श्री पवनदेव, श्री वायुदेव, सुत का पथ सुगम बनाते थे।।
अतुलित बलधाम स्वर्णगिरि सम, दानवदल - विपिन दहनथेयह ।
ज्ञानी, गुणनिधि, रघुवीर दूत कपिवर, मारुतनन्दन थे यह ।
सच्चे शंकर अवतारी थे, सच्चे श्री रामदुलारे थो ।
फिर भला इन्हे किसका डर था? यह जगदम्बा केप्यारे थे।।

 


सिंहिका राक्षसी - सागर में, माया का खेल दिखाती थी।
परछांई पानी पर निहार, उड़ता पक्षी खा जाती थी।।
छल यह ही किया पवनसुत से - तो बध को यह लाचार हुए ।
पग - प्रहार से सहार उसे निर्दधन्द सिन्धु के पार हुए।

गिरि चढ़ 'देखा दूर से लंकानगर विशाल
जहॉ राक्षसों ळे सहित रहता था दशभाल ।।

कंचन का दर्ग समुद्र मध्य, सुन्दर चौहटट हाट का थाा ।
सब राजपाट, सब घाट-बाट, सब ठाट विराट ठाट का था।।
वह स्वर्णदीप, वह स्वर्णदेश सचमुच कबेर की नगरी थी।
जिस में वसुधाभर की सम्पत् उन यक्षराज ने रक्खी थी।l
सौतेले भाई रावण 'ने - उस पर अधिकार जमाया था ।
यक्षों के लिए भगाया था, असुरों को वहाँ
बसाया था
वह शैव, विभीषण विष्णुभक्त घननाद शक्ति कहलाता था।

पाणिडत्य, कला कौशल बल में, कुल ऊचा समझा जाता था ।
विज्ञान - वादिता इतनी थी, बन गईं रुप नास्तिकता का।
भोजन विलास मादकता ही - था लक्ष्य प्रजा का, राजा का।।
इतना ा प्रबल निशाचर दल - भूतल जिससे थार्राता था ।
प्रत्येक देश को दबा दबा - अपना दबदबा बढ़ाता था।।

सूक्ष्म रुप धर रात में - पहँचे श्री हनुमान ।
मिली लंकिनी राक्षसी, काली निशा - समान ।

सब बाल व्याल थे खुले हुए सिन्दूरी तिलक भाल पर था।
दो दाँत चमकते थे बाहर, हाथों में खडग भयंकर था।।
बजरंगी की आहट पाकर - सम्मख आई किटकिटा उठी ।
'में तुझको खा ही जाऊँगी" - यह कह खाडा खड़खड़ा उठी ।।

बजरंगी कहनेलगे - "चल हट, होजा मौन।
रामदूत से विश्व में भिड़ सकता है कौन ??


में महावीर कहलाता हूँ हनुमत् है विदित नाम मेरा 

तुझसी चुड़ैलियाँ हनता हूँ यह भी है एक काम मेरा ।।
नभवाली 'सात्विक सुरसा को आया हू जीत बुद्धिबल से ।
जल की 'तामसी सिंहिका को कर दिया नष्ट क्रोधानल से।।
थल पर राजसी लंकिनी को - अब मुष्टिक 'मार गिराऊँगा।
जीतूँगा जब त्रिगुणी माया तब भक्ति -मातु कोपाऊगा।।

यह कह हल्के हाथ से - मुष्टिक मारा एक ।
गिरी घूम ' वह भूमि पर' जागा पूर्व विवेक।।
बोली - "'ब्रह्मा ने रावण को जब लंकाधीश बनाया था -
लंकिनीरुप मुझ लंका को - तब यह भविष्य बतलाया था।।
मुष्टिक प्रहार कर महावीर - जिस दिन तुझ पर जय पाएंगे।
बस तभी समझ लेना निश्यय निश्चर सब मारे जाएँगे
जो वाणी से सत, पग से तम, कर से रज पर - जय पाता है।।
ऐसा ही बाल ब्रह्मचारी, निर्गुण " को निश्चय ' पाता है।।
हनुमान तुम्हारे दर्शन कर - मैं बडभागिनी महान हुई।
इन चरणों की रज ले लंका - सचमुच केलाश समान हुइं
हे महावीर, हे महाधीर, रघुवर का तुझ r पर हाथा रहे
जा बेखटके अब लंका में, जय और सफलता साथ रहे ।।


सीतापति रधुनाथा ' का, बार बार ले नाम ।
उधर हटी वह लंकिनी, इधर बढे बलधाम ।


प्रत्येक भवन में रावण के - ढूंढा श्रीसीता माता को।
शयनालय से बन्दीगह तक - खोजा श्रीसीता माता को ।
चप्पा चप्पा कोना कोना - छाना राक्षस की नगरी का।
पर, पता न लगा कहीं पर भी- रघुकुल - महिला वैदेही का।।
होकर हताश होकर निराश किसतरह बनेगा काम ? कहा
अन्तर आत्मा ने उसी समय 'श्रीराम' कहा 'जयराम ' कहा ।

अकस्मात्  देखा तभी एक मनोहर धाम ।
द्वारे जिसके लिखा था - 'राम राम श्रीराम'।


झाँका'तो -देखा आँगन में तुलसी बिरवे थेलगेहुए ।
दीवारों, खम्भों, आलों पर - संद्र्भ वाक्य थे लिखे हुए।।
बजरंगी ने सोचा
''कोई हरि-भक्त यहाँ पर रहता है ।
पर इस राक्षस नगरी में यह - कैसे व्यतीत दिन करता है।
यदि कोई सज्जन आस्तिक है तो इससे मिलना बरा नहीं ।
फिर बिना एक भेदी के भी हो सकता अपना भला नहीं।।'
रात शेष थी पहर भर, होनहार था काज ।
'राम-राम' कहते हुए - जगे विभीषणराज ।
वह घरवाला वह गृहस्वामी, दूषण नगरी का भषण था
रावण का छोटा भाईं था, उसका शुभ नाम विभीषण था।। T
यह सामब बिमीषण मरंपी- कादीषूरकाजाप रावण
मा घटना पिछली, तब की है दशकन्धर जब तप करता था ।
मेैंमरँन यक्ष राक्षसों से वरदान लिया यह काता शा "
'हरि भक्तिं प्राप्त हो जाय मुझे - मांगा यह वचन विभीषण ने।
तब से ही भक्त विभीषण में - दिन पर दिन भक्ति बढ रही थी ।
उस भक्ति भाव के साथ साथ -र सेवा की शक्ति बढ़रही थी।।
हनुमत ने जब धर विप्रुप, बाहर से जय 'श्रीराम ' किया।
सानन्द विभीषण उठ आए ब्राह्मण को देख 'प्रणाम' किया।।


कहा धान्य हू आज मैं, पा ऐसा मेहमान ।
क्या आज्ञा है दास को बतलाए श्रीमान् 

 

हे विप्र, आपको देख देख - यह हृदय आप ही खिंचता है।
है निश्चय आप भक्त कोई - यह मुझे दिखाईं पड़ता है।
बड़भागी करने आए हैं - क्या मुझसे मूढ निशाचर को ?
हे महाराज, श्रीचरणों से करिए पवित्र मेरे घर को।।
जो कुछ भी रामप्रसादी है, फल, कन्द मूल स्वीकार करें।
अपने इस दास विभीषण पर अपना इतना उपकार करें।


'नाम-विभीषण और फिर यह प्यारा व्यवहार' !
धीरे - धीरे इस ' तरह - बोले पवनकुमार -


''अचरज है -कागों के दल में, यह हंसरुप दर्शन कैसा !
काँटों से भरे करीलों में - मलियागिरि का चन्दन कैसा ! !
असुरों में कंसे भक्त राज, तुम जीवन यापन करते हो 
रावण की सेवा में रहकर श्रीरामोपासन करते' हो ।।'
वे बोले - जैसे जिव्हा है बत्तीस नकीले दाँतों में।
रहता है दास विभीषण भी - बस उसी प्रकार राक्षसों में।।'
कपि बोले - "मुँंह की बत्तीसी सब टूट-फट गिर जाएगी।
पर, जिव्हा जीवनभर रहकर श्रीराम नाम-गुण गाएगी।।


भक्त विभीषण, धन्य तुम धन्य तुम्हारा प्रेम।
धान्य तुम्हारी धारणा धान्य तुम्हारा नेम।।

 

जो सज्जन हैं सत्संगी हैं, वे कहीं छिपाए छिपते हैं ?
एक ही पन्थ के दो पन्थी - इस प्रकार देखो मिलते हैं।।
तुम भाई हुए आज मेरे अब तुमसे मुझे कपट क्या है ?
सब गुप्त रहस्य
पुनाता हूँ - जो अभी छुपाकर रक्खा है।।
योंतो छल और कपट जग में- पातक ही समझा जाता है।
पर, भक्त वैष्णवों के सम्मुख " - वह महापाप कहलाता है।।
ब्राह्मण
शरीर का धोखा है, मैं हनूमान हू बानर हं।
सीता सुधि लेने आया हूँ, श्रीरामचन्द्र का अनुचर हूँ।


''रामदास ! मेरे यहाँ ! जागुति हे या स्वप्नहै
भक्त विभीषण हुए कुछ - इसी ध्यान मेंमग्न।।


कह उठा हृदय - खुल गया भाग्य, आए श्रीरामदलारे हैं।
ब्राह्मण से भी यह बड़े, मुझे मेरे प्यारे के प्यारे हैं।।
फिर कहा प्रकट - '"हैं धन्य आप, जो राघवेन्द्र के अनुचर हैं।
प्रत्येक दिवस प्रत्येक घड़ी," प्रभु की सेवा में तत्पर हैं।
क्या मुझ अनाथ निश्चर के भी -रघुनाथ बनेगे नाथ्ा कभी
क्या 'मुझसे अधाम दास को भी - रक्खेगे राघव साथा कभी ?


सीता की सुधि पीछे लेना - पहले मेरी सुधि लो भाई।
जिन चरणों में रह रहे आप, मुझको भी पहँचा दो भाई।


'देख विभीषण की दशा, पुलके पवनकुमार
यमुना से गंगा मिली, बढ़ा सनेह अपार।।


बोले भगवान 'दयानिधि ढै। अपने को नित अपनाते ढहै।
जो जन उनकी शरणागत ' हो छाती से उसे लगाते है।।
यह रीति सदा से है उनकी - करते है प्रीति सेवकों से।
जो उनका हीहो जाता है निर्भय रहता हेै कष्टों से ।l
उनके मिलने की राह यही - विश्वासी हो जाओ भैया
अपना सब उनके अर्पण कर - उनके ही हो जाओ भैया ।।
मंत्रों' से जैसे सप्तसिन्ध आजाते एक कलश में है ।
त्यों ही भावना विमल हो तो - भगवान भक्त के वश में है ।।
है सत्य जहाॉ - भगवान वहीं, है प्रेम जहा भगवान वहीं
हो जाता दयापात्र जब जन, मिलते है दयानिधान वहीं ।
मुझको ही देखो - बानर हँ, उपचार, ध्यान जानता नहीं।
चरणों की सेवा टे सिवाय - दूसरा ज्ञान जानता नहीं =
फिर भी वह मुझको देखते हैंतो हृदय कमल खििल जाता है।
सम्पूर्ण कृपा देदी मुझको - ऐसा अनुभव में आता' है।।
तुम भी तज साथ राक्षसों का, आजाओं भालु कपिगणों ें।
आचरणो को पाला अबतक - तो अब पहुचा आ- चरणों में ।।
इतना बतलादँ जीवात्मा - जब पास ब्रह्म के जाता है ।
तो उसके पीछे पीछे सब - माया का वैभव आता है।

हो सकता है वह दिन आए, जब भाग्य इस तरह चमका हो ।
सिर पर हो राम विभीषण के - चरणों पर सारी लंका हो ।l
इसलिए जाति भ्रातादिक के सम्बन्धों में अब रत मत हो।
मेरे मत से--हे भक्तराज, रघुनायक के शरणागत हो
मैंने तो यह ही समझा है, इसमें ही सब आजाता ' है ।
मालिक का जो हो जाता है, मालिक को वह पा जाता है ।।


भक्त विभीषण होगए क्षणभर को गम्भीर ।
गदगद् उनकी गिरा थी - नयनों में था नीर ।।


बोले- प्रत्यक्ष आज देखी - महिमा मैने सत्संगत की।
सत्संगत - क्षणभर में धोती श्यामलता जीवन रंगत की ।
जग के सब लाभ पराजित " हैं सत्संगत वाले लाभों से ।
स्वर्गादि तुच्छ है - तुलने पर - सतसंगत - सुख के बाटों से।।
तुम नहीं मिले ढे रामदास, जग
गए भाग सोते के है।
इस समय जन्म जन्मान्तर के, सब पुण्य इकट्डे प्रकटे है ।।
अच्छा, अब जिस कारण आए, उस सेवा में जाओ भाई।
है मात 'अशोक वाटिका' में - सुधि उनकी ले आओ भाई ।
यो तो कुछ गुप्त सेविकाएँं, इस सेवक ने भी रक्खी हैं ।
रहकर अशोकबन, में भी वे मेरी निगाह में रहती हैं ।।
लंकानगरी में भी सीता मिथिलापुर 'ही की सीता हैं ।
श्रीरामचन्द्र - चन्द्रानन की ज्योतिर्मयि स्वच्छ चान्द्रका हैं।
वे माता है तुम भ्राता हो, 'दोनों 'का तुच्छ दास
निर्भय विचरों लंकापुर में छाया कीतरह पास

पग - पग पर जय दिया - इनको हर्ष महान ।
तभी चले अंजनितनय - कह 'जय कृपानिधान '।।

 

उत्साह वही, आदर्श वही, चिन्तन वह ही सीताकाथा।
अनराग वही, अभिलाष वही, वह ही स्वरुप छोटा सा था।
पहुच अशोकवन में जब यह तो दूश्य विचित्र उपस्थित था।
कहने को वह अशोक था- पर सर्वत्र शोक आच्छादित था।।
सुनसान विपिन की कुटिया में कुछ रजनीचरी उपस्थित थीं।
बाहर पत्थर पर प्रतिमा ' सी वैदेही ध्यानावस्थित थीं।
पृथ्वी की ओर देखती थीं टकटकी लगाए बैठीथीं ।
मटियाली, बडी - बडी अलकें - मुखडे के ऊपर बिखरी थीं।
सब अंग विरह की झुलसन, से होरहे सूखकर कॉटा हें ।
थी ऐसी क्षीणकाय, मानों हडी चमडी का ढाचा हैं ।
आखों में राम रम रहे थे - विश्वास हृदय में गहरा था।
यद्यपि सब ओर अशोकों के राक्षसियों का भी पहरा- था ।
इतने संकट होने पर भी, सतबल पर अपने जीवित थी।
था चारों ओर धुओं फिर भी, वे अग्निशिखा सी दीपित थीं।।


थ्नी नहीं वियोगिनि, योगिनि थी, गोदी में माँ वसन्धरा की।

आकाशदेव ' की छाया शी, रक्षा थी पवनदेवता की ।।


रामदूत ने दूरसे समझीसारी बात-
कुण्डल फेंके - जिन्होंने - है यह वह ही मात।


रघुवर में लीन प्राण इनके, रघुवर इनके प्राणों में ैं ।
'इसलिए कष्ट सहकर भी यह अबतक जीवित असरों में हैं ।
नारी की सुन्दरता पति है, पतिसेवा से यह वंचित हैं ।
इस कारण सुन्दर होकर भी शोकातुर धालि  धासरित हं।।
संसार राम सीता तक को, जब इतने संकट देता है।
तब साधारण जीवों की तो इस जग में गिनती ही क्या है ॥।
चरणों में अभी लोट जाऊँ - जीतो मेरा यह कहता है -
घबरा जाए माता न कहीं - यह सशय रह-रह उठता है ।
अच्छा 'मन ही 'मन है प्रणाम शभ दिन तो सम्मुख आया है ।
बड़भागी है यह रामदूत - माँ का दर्शन तों पाया है।


पत्ते खडके उसी क्षण, गगन हुआ कछ लाल ।
दिखलाई दी दूर से - जलती हई मशाल 
समझ लिया आरहा है - इसी ओर दसमाथ ।
मन्दोदरी आदिक क्ड - सन्दरियाँ हैं साथ।।

 

सोचा - "थोड़ी सी रात रही - यह अवसर तो पूजा का है।
रावण इस समय आ रहा है ! क्या है रहस्य कारण क्या है।।
राक्षस भी है माता भी हैं छुपकर देखूँ क्या होता है।
सब भेद जानकर ही प्रकटँ इस अवसर यह ही अच्छा है।


यद्यपि माँकी दशा से व्याकल थेा हनुमन्त
फिर भी वृक्ष अशोक में, छुपे रहे बुब्धिमन्त !
दशकन्धर आया इधर बोल उठा कर जोर -
कृपादृष्टि से देख ले सीते ! मेरी ओर ।।
यह सुनते ही सिया के - लगी हृदय में चोट।
बोली नीची दृष्टि से - कर तिनके की ओट -


''कांक्षा थी कृपादृष्टि की तो, वह शिवधान्वा तोडा होता
बल था तो उसी स्वयवर में मुझसे नाता जोडा होता ।।
तू योद्धा नहीं चोट्टा है हरकर लाया है अबला को ।
छल-बल अब भी दिखलाता है, समझा ही नहीं सत्यता को ।।'


वह बोला - "छल-बल नहीं, नहीं और कछ ध्यान ।
दशकन्धर तो चाहता -दयादष्टि का दान।।


पर, तुममें अबतक पर्दा है आँखें नीची ही रखती'हो।
तिनके की ओर देखती हो बातें दशमुख से करती हो।
तिनका क्यों लक्ष्य तुम्हारा ढै ? क्यों उसे बीच में लाती हो ।
क्या तिनका मुझे समझ रक्खा जो तिनका मुझे दिखाती हो ।।"


तिनकेवाली ने कहा - "सुन तिनका की बात ।
पृथ्वी मेरी मात है तिनका मेरा भ्रात ।।

जिन चरणों की 'दासी हंमैं 'तिनका है तिनका दास सदा ।
यह मन है जिनके पास सदा तिनका भी तिनके पास सदा।।
हे तिनके से भी गिरे जीव, तिनका ही मेरा पर्दा है ।
घंघट का पर्दा पर्दा क्या ? पर्दा तो आँखों ही का डहै।।
पहुँचादे पास उन्हीं प्रभु के सीता से नाता है जिनक
अन्यथा, एक दिन असुर तुझे धिक्कारेगा तिनका तिनका ।।
सम्पर्ण रात जुगनू चमके उनसे कब नलिनी खिलती है ।
होता है प्रातःकाल जभी तब स्वयं कमलिनी खिलती है।।
यह आँखें अगर कमलिनी हैं, तो इनके प्रिय श्रीरघुवर हैं।
तू जुगनू से भी घटकर है वे सूरज से भी बढ़कर हैं।।


'लंकापति खद्योत-सम रवि सम-अवधाकुमार '
रावण यह सुन जल उठा, कहा खींच तलवार -


"अबतक कर जोड़ नम्रता से, मैने तुझको समझाया है।
पर तूने जब-जब आया मैं - अपमानित कर टुकराया है।।


अब अनितिम बार कह रहा हूंयदि नहीं मुझे अपनाएगी
तो यह 'तलवार - एक क्षण में - उस पार तुझे पहुचाएगी।।'


रावण की ललकार ' से -डरी नहीं जगदम्ब ।
महाबली, नारायणी बोल उठी अविलम्ब


"हे कायर पामर, रजनीचर क्यों पशुबल पर इतराता है ?
पिंजरे में फंसी सिंहिनी को, नंगी तलवार दिखाता है ?
तलवार मुझ मेरे सत को, सत यह दे काट नहीं सकती
मेरा पावन पवित्र लोहू यह पतिता चाट नहीं सकती ।
सतवन्ती का सत तो सदैव सत की कृपाण पर रहता है ।
ब्रत पतिव्रता क्षत्राणी का सब समय प्राण पर रहता है।।
मत समझ अकेली हैं सीता, उसका -मालिक है साथा सढा
इस रोम-रोम में, र रग में रम रहा राम रघुनाथ सदा।।
पर नारी को हरकर लाना - क्या बलवानों की बाते हैं?
तलवार उठाना अबला पर - क्या मर्दानों की बाते हैं ?
लंकेश नहीं कायर है तू लंका में मुझे छुपाया ' है ।
जा, लजा डूबजा जलनिधि में, क्यों खड़ग दिखाने आया है ?
नभ के नक्षत्र न अन्धे हैं, बडे न पवन के झोंके है ।
तृण-तृण अशोक-उपवन के अब बदला लेने को उटठे हैं।।

अगणित आँखों से यह अधर्म वह व्यापक देव निरखता है ।
इन पेड़ों में इन पत्तों में - बैठा कोई सब सुनता है।।


यह सुनते ही हो गया दशमुख फिर विकराल ।
खइग तान संहार को - दौड़ पड़ा तत्काल ।।
बोला देखं तो सही करता 'कौन सहाय i
घट व्यापक है कहाँ ? अभी प्रकट हो जाय ध
जभी तोल तलवार की - धाया राक्षसनाथ ।
'सरवैश्वर कह, सिया ने झुका दिया निज माथ ।।
घट - घट व्यापक ने दिया परिचय वहीं तुरन्त ।
मुख से मन्दोदरी के, बोला वह भगवन्त 
"ठहरो, क्या कर रहे हो ?अनुचित हैयह नाथ !"
इतना कह, पकड़ा तुरंत पीछे से वह हाथ।।


रानी ने जब समझाया 'तो - आया विचार कुछ राजा को ।
जाते जाते निश्चरियों से, बोला कि - "सताओ सीता को।।
देता हँ समय तीस दिन का, तब तक न उचित उत्तर होगा।
तो करनी का फल पाएगी यह खंग और' वह सर होगा।।
मन हीं मन उधर कहा कपि ने - "माँ का न मलिन अंचल होगा।
उसक पहले मेरा मुष्टिक तेरा वह वक्षस्थलहोगा
तरुवर अशोक के बोल उठे - हम उससे प्रथाम उजड़ते हैं।
लंका के महल लगे कहने - उसके पहले हम जलते हैं।।
त्रिजटा नामक निश्चरी थी चतुरा अत्यन्त ।
चला गया दसशीश तो वह कह उठी तुरन्त -
"निश्चरियों, सुनों ध्यानपूर्वक जो कु भी है सपना मेरा।
मानना पड़ेगा अब तुमको - आदेश और ' कहना ' मेरा ।।
मैंने सपने में देखा 'है दशकन्धार का संहार हुआ ।
लंका पर भक्त विभीषण का - राजा जैसा अधिकार हुआ।।
बन्दिनी आज ढें रामप्रिया कल सम्राज्ञी कहलाएगी
हम कष्ट इन्हें देंगीतो यह बदले गम्भीर चुकाएंगी ।।
इस कारण मैं यह कहती हूँ - लग जाओ इनकी सेवा में ।
सज्जनता सदा लाभ देती होती ह हानि दुष्टता में।l"
असुरा त्रिजटा के मुख से भी जब प्रकट विश्व आधार हुआ।
जनीचरियाँ सेविका बनीं कपिवर ' को हर्ष अपार हुआ


चली गई सब राक्षसी- निज - निज गह की ओर ।
तब त्रिजटा से जानकी बोलीं यों कर जोर -
 

तू मेरी मात धर्म की है मन की मैं तुझसे कहता हू

पतिविरह - विपत् सहते सहते जीते जी पूर्ण मर चुकी हूँ।

अब इस शरीर के ढाँचे को कर डालं भस्म यही अच्छा ।
दो पक्ष नहीं -दो घडियों में तजत़ँ यह प्राण तभी अच्छा।।
लकड़ियां बीन मैं लाती हँतूभां कछ मझे सहारा दे ।

मैं चिता बनाए लेती हूं जा आग कहींसे तू ला दे
त्रिजटा ने देखा जभी इतना दारुण ताप।
समझाया रघुनाथ का उनको प्रबल प्रताप ।


मिशिलेश नन्दिनी, धीर धरो, क्यों इतनी व्याकल हो कल से ?
उस सूर्यवंश के सूर्य राम, अब उदय हुए उदयाचल से।।
थोड़े दिन और रह गए हैं, धीरज ही धारो वैदेही।
जिस व्रत को अब तक पाला है, आगे भी पालो, वैदेही।।
थक गई, कष्ट पर कष्ट सहे, सम्पूर्ण शरीर सुखाया है।
फिर भी है धन्य तुम्हें देवी, तुमने पतिधर्म निभाया है।।
माता के विमल चरित्रों की - पाईं जब साक्षी त्रिजटा से ।
पत्तों में छूपे दुत का तन पुलका उद्टा तब शद्धा से ।।
सीखो, हे दुनियाँ की बहनों. पतिधर्म, पतिव्रत सीता से।
पतिवियोग में जीवन रखना - रहना इस भाँति तपस्या से ।।
पति के हित राजमहल तजकर - बन बन के संकट सहना, यों।
वेपता छूटकर फिर पतिसे- राक्षस के मुह में रहना, यों।।
अखिर अब चिता बनार्ड है पतिव्रत पर आच न आने दी ।
बलिहारी भारत की 'देवी - भारत की लाज न जाने दी।


अभी रात है इस समय कहा मिलेगी ज्वाल ?
यह कह त्रिजटा भी गई, उस अवसर को टाल।।
सन्नाटा सब ओर था पत्ते तक थे शान्त
सम्मुख आधी चिता थीं नीरव निठुर, नितान्त ।|
नयन चिता की ओर थे मन रघुवर की ओर ।
हृदयसिन्धु में विरह की, उठने लगी हिलोर।।


पक्षी तन पींजरे मे, रहन सका चुपचाप
रोकर श्रीजानकी - करने लगीं प्रलाप -

 

ठहर गईं फिर एक क्षण, फिर कुछ उट्ठी हूक ।
''प्राणनाथ '"' कह फिर उठा आत्म-पखेरु कूक
थे अशोक के वृक्ष पर, छुपे अज्जनीलाल
'देख जानकी की दशा - आया एक खयाल ।
'वक्षों तक से अगिनि का - जब कर रही सवाल ।
हो न जाय इनमें कही पैदा सत् की ज्वाल ?
इस ख्याल से विकल जब हुए अंजनी लाल ।
दी अशोक के पेड तुरत अंगूठी डाल 


गिरते 'ही चमकी मुँदरी यों - मानो चमकीला तारा है ।
सीताजी 'बढी उठाने को समझी अशोक अगारा है।।


मुद्रिका परम सुन्दर थी वह, हीरा था जिसमे जडा हुआ ।
श्री रामचन्द्र रघनायक का - था नाम बीच में खुदा हुआ।
पहचाना
जभी अंगूठी को आनंदित सिया अपारहुईं।
फिर ' कछ विचार आए ऐसे बिजलियाँ हृदय केपार हुईं।
"मुँदरी विवाहवाली ही है"- इसलिए, लगार्ड आखो से ।
''कैवट को देने कोदी थी'- मैने ही अपने हाथो से।।
पर यहाँ किस तरह आई यह ? क्या घटना है ? क्या लीला है।
माया
ऐसी 'न बना सकती, टे सकता असुर न धोखा है।।
तब ? प्राणेश्वर के प्राणी की, क्या इसमें छुपी सूचना है ?
पर रघुनायक तो हैं अजेय, इस शंका में क्या रक्खा है ?
बंधा गए खयाल
जभी ऐसे दिल पर फिर ढश्वारी आई

इतने में - उस अशोक पर से आवाज एक प्यारी आई
श्रवणों द्वारा जब किया - नामामृत का पान ।


तब बोली - तुम दूत हो, तो क्यों अन्तर्ध्यान ?
वे जैसे ओझल रहते है व्यापक होकर भी आंखों से ।
त्यो हीं तुम छिपते फिरते हो, पायक होकर भी आँखों से।।
'प्राकृत भाषा भी बोल रहे, चरितामत भी बरसाते'हो ।
फिर है अशोक के गुप्त दूत, क्यों नहीं प्रकट हो जाते हो ?


आज्ञा पाकरमात् की प्रकटे पवनकुमार -
झिझकी सीता 'देखकर रुप वानराकार ॥

 

तब कहा डन्होंनेमाता, मैं शपथपर्वक कहता
करुणानिधान ने भेजा है- सेवा में उनकी रहता हूH

कहते है हनूमान मुझको सधि लेने हीं में आया हू।
विश्वास आपको हो जाए - इसलिए अंगूठी लाया ह


हनूमान के वचन सुन - मिटा सभी सन्देह ।
दूत जान रघुनाथ का -हुआ हृदय से नेह 


"बोली - मृततृल्य अवस्था को - यह मिलन अमृत की धारा है ।
अथवा हनुमान डूबते को दिखलाई पडा किनारा है।।
अच्छा पहले यह बतलाओ टे अनुज सहित अच्छे तो है ?
खरदूषण - त्रिशरा संहारक, मेरी चर्चा करतेतो है ?


यह सुनकर, हनुमन्त ने कह - 'जय सीताकान्त '
सुना दिया सब आदि से अब तक का वत्तांत ।।
फिर कहा- नहीं सुधि रखते तो - सुधि लेने को क्यो भेजा है ?
मां वहॉ और कछ बात नहीं ढिन रात आपकी चर्चा दे।।
जितने दुख आप सह रही है, उसे दूने वेसहते है ।
ज्यों धान रहे बे पानी के - इस भाँति दयानिधि रहते है ।
लका पर रघुकुल का डका, हे माँ,अब बजने वाला है ।
वह नौका डूब नहीं सकती - जिसका राघव रखवाला है ।
फिर राम भजन कर रही आप - यह भी तो फल दिखलाएगा ।
इस बल ही से बानर - मण्डल निश्चरदल पर जय पाएगा।।
दिनकर जिस समय उदय होता - फिर नहीं तिमिर रह पाता है।
हिमगिरि जब हिलने लगता है तो भ्तल तक थराता है।।
रजनीचर जो रह रहे यहाँ - वीभत्स विकट, बेढंगे 'से ।
वाणों की अग्निशिखाओं में झुलसेंगे स्वयं पतंगे से।।
मा आज्ञा नही नाथ की , अन्यथा दास दिखला जाता।
लंका को क्षण में चौपट कर में तुमको अभी लिवा जाता।।


बजरंगी के वचन सुन, हुआ हृदय को चैन ।
कछ क्षण के उपरान्त फिर बोली सीता बैन ।


"राक्षस है कज्जलगिरि - समान, काले - काले मतवाले से।
तुम मुझे दिखाई देते हो छोटे से, भोलेभाले से।
क्यों कर उन पर जय पाओगे ? सन्देह मुझे यह भारी है ।
उद्योग उस समय निष्फल है - जब साधन की लाचारी है।।

देखा जब बजरंग ने-माँ हो रही अधीर 
योगशक्ति से काम ले -- विस्तत किया शरीर ।


गर्जना गगन में उठी, योजनभर के बलवीर हुए
संग्राम - भयंकर, विकटानन, भूधराकार, रणवीर हूए।।
फहरा उट्ठी बल की पताक, भहरा उठी शका सारी -
हहरा उठी राक्षस ' सेना, थहरा उट्ठी लंका सारी।।


सीता जी को हो गया - पूरा जब विश्वास -
तो फिर छीटे बन गए - सीता पति केदास।।


कर जोड कहा- "'मन की श्रद्धा अब होठों पर आपहँची है ।
जिस जन के आगे प्रभुन छृपे, माता कैसे छप सकती हैं।
है वरदायिनि, है जगज्जननि यह सब कछ आप कर रही हैं ।
हाथी का नाश कराने को - चींटी में शक्ति भर रही हैं।l
पृथ्वी का भार हटाएग - प्रभु की जब हुई प्रतिज्ञा यह
तब अपना हरण करा माँ ने कर डाली पूर्ण समस्या यह।।
हम लोग निमित्तमात्र ही है, लीला के लिए खिलौने हैं ।
आकाश चन्द्र के छने को, बढ़ते ही जाते बौने हैं।।
इसलिए सिद्ध यह होता है अपनी न तनिक चतुराई है ।
यह प्रभुकी सब प्रभुताई है, या माँ हो रही सहाई है।।
निश्चर पर दृष्टि नहीं डाली - इस कारण कहा शक्ति उसमें।
वह जीते जी है मरा हुआ, है कहाँ विवेक बुद्ध उसमें।
ढे श क्तिस्वरुपा, जगदम्बा, हम भिक्षुक उसी दृष्टि केहैं।
जब हम पर कृपा द्रष्टि है तो भिड सकते महाकाल से हैं।।


डाला यह कहत हुए - उन चरणों में माथ -
तुरत उठाया लाल को - माँ ने हाथों हाथ।।


फिर क्पादूष्टि से अवलोका बोली - 'देती हूँ शक्तितुझे।
दी बुद्ध तुझे दी युक्ति तुझे, दी मुक्ति तुझे, दी भक्ति तुझे।।
माता ' का आशीर्वाद यही हो जाओ अजर अमर बेटा।
रघुनाथ तुम्हारे नाथ रहें तुम रहो सदा अनुचर बेटा।।
श्रीरामचरित' के प्ष्ठों में तेरा भी नाम महान् हुआ।।
श्रीरामनाम के साथ साथ,' तू भी प्रसिद्ध हनुमान हुआ।
यदि कही राम-मंदिर होगा' तो रामदुलारा भी'होगा ।
सीता लक्ष्मण के साथ-साथ, यह हनुमत प्यारा भी होगा।।
( इति )