सीताजी से जब मिला हार्दिक आशीर्वाद ।
हनुमत न्ने समझा उसे - जीवन लाभ प्रसाद ।।
श्रीजी के वाक्य नहीं शे वे अनमोल रत्न थे चुनेहुए।
मन-मानस में ले - कपि उनको - साहस धन से सौगुने हुए।।
फिर ऐसे भाव - निमग्न हुए अपना अस्तित्व भुला उद्ठे।
पा प्रबल शक्ति झूमने लगे, पा विमल भक्ति पुलका उट्ठे।।
कितने ही क्षण मौन रह, फिर बोले साल्हाद -
''जन्म सफल मेरा हुआ - पाकर आशीर्वाद
हे माता, अब हे विनय एक यद्यपि कछ हृदय हिचकता है।
फिर भी मख खोल कहे माँ से बालक का चित्त मचलता है ।।
आया ह सिन्धा लॉँघकर मैं इस कारण भख सताती है-
यह पेड फलों से लदे देख, इच्छा भी बढती जाती है।।
रखवाली पर जो माली है, उनका किचिंत भय नहीं मुझे ।
जब कपा-द्ष्टि माँ की है तो सकुचाहट संशय नही मुझले।
देख बुद्ध बल धाम सुत बोली माँ तत्काल
"रघुराई को हृदय धर - जाओ मेरे लाल ।।
शीश नवाकर मात को पढ-रज लेकर माथ ।
अवधनाथ का ध्यान धर चले मुद्रित कपिनाथ ।।
जिस डाली पर डाली निगाह वह डाली डाली फिर न रही।
फल फल तोड सब फेंक दिए लाली हरियाली फिर न रही।।
हर्षित हो-हो किलकार मार तरू तरू पर धाने लगे बली।
मीठे-मीठे फल छाँट - छॉट, जी भर-भर खाने लगे बली
फल खाकर तरु उखाडते थे, सागर में उन्हे बहाते थे।
मालीगण सम्मुखा आते तो शाखाएं मार भगाते थे ।।
रखवाले बजरंग की बार बार खा मार।
पहुंच दशानन - सभा में करने लगे पुकार ।।
"स्वामी, आया है कीश एक, वाटिका उजाड़ रहा है वह
फल खाने की कुछ बात नहीं, पर पेड उखाड़ रहा है वह।
बानर है नहीं प्रलय हेै वह, या यमपुर का हलकारा है ।
विस्मारा है सारा अशोक, राक्षसगण को बस मारा है।।"
उन सबकी यह टेर सुन, काँप उठा दशभाल ।
"जाउ भगादो कीश को' भेजे भट तत्काल
खलदल आता देखकर उछल पड़े हनुमान ।
वृक्ष हिलाकर वेग गर्जे मेघ समान ।।
सुनते ही शब्द असुर कापे फट गए युगलपट कर्णों के ।
बजरंग ने रंग वह दिखलाए भदरंग हुए मुह राक्षसों के।।
कछ मींज दिए कछ खूद दिए कुछ पेड गिराकर दबा दिए
कुछ पकड़ सिन्ध में फेंक दिए, कछ बाँध पूछ में घुमा दिए।।
बजरंगी ने रणरंगी ने क्षण में रिपु यमपर पहंचाए।
कुछ बचे खुचे, अधमरे असुर फिर राजसभा में चिल्लाए ।l
रावण अति क्रोधित हुआ सुन दूसरी पुकार ।
उसी समय सेना - सहित भेजा अक्षकमार ।
इधर बली बजरंग ने - उड़ती देखी धूर ।
समझ लिया आ रहा है अबके कोई शूर
इस बार किया ऐसा गर्जन, काॉपा पत्ता - पत्ता बन का।
मारा उखाड़कर वृक्ष एक, मह फेर दिया खलनन्दन का =
झट तरु से कूद, पकड़ गर्दन झटका 'दे घोष किया जय का।
छाती पर एक लात मारी - फट गया कलेजा अक्षय का।।
बजरंग सिंह की मूर्ति देख बकरी -सा वह मिमिया उट्ठा।
क्षय हुआ एक क्षण में अक्षय सिर महाकाल मंडरा उटठा।
तब धाए खलदल पर कपिवर ज्वालामुख आग - बबूले से ।
रिपुलगे विलोने क्रम क्रम से पानी के निबल बगले से।।
चुटकी में चट पुट शत्रु हुए वह महाप्रलय दिखलाइ दी।
कुछ बचे खुचे फिर भाग चले जाकर इस भांति दुहाई दी।
रावण ने यह टेर जब सुनी तीसरी बार
अक्षयसुत की मृत्यु सुन बोला तनिक विचार ।।
""इन्द्रजीत, अब जाउ तुम बानर है बलवंत ।
वध मत करना बॉधकर लाना यहॉ तुरंत ।
देखंतो मैं कौन ढे ऐसा बल भडार ।
जिसने मेरे अक्ष को रण में दिया संहार ।।
मेघनाद पहुंचा, जभी हँसे पवन केलाल।
ताड लिया इस बार है योद्धा एक विशाल ।।
फिर गर्ज तर्ज तरुवर ' उखाड, सीधा प्रहार भरपूर किया ।
रथवार सहित घोडे मारे रथ को भी चकनाचर किया ।।
सारा 'दल अंगरक्षाकों का संहार दिया बजरंगीने।
फिर इंद्रजीत के निकट पहंच जयनाद किया बजरंगी ने।।
हल्का सा मुष्टिक कर प्रहार किलकार उठेतरू पर जाकर ।
उस इन्द्रजीत ' से योद्धा ' को मूर्छा आई मुक्का खाकर।।
मू्छा से जग मायावी ने दिखालाया मायाबल सारा।
बजरगबली से वश न चला, मिल गया धूलि में छल सारा।।
उछल रहे थे वृक्ष पर पवन पुत्र साल्हाद
नीचे से कहने लगा झुंझला कर घुननाद।
''डाली डाली उछल कर दिखलाता है चाल।
बन्दी करता हूँ अभी, अपने लिए संभाल।[
में मेघनाद कहलाता हूं बैरी को सदा हराया है -
जीता है मैने स्वर्गलोक, पद इन्द्रजीत का पाया
पर तू भयभीत न ही मन में बल नही तुझे दिखलाऊंगा ।
श्रीमान पिताजी के सम्मुख केवल तुझको ले जाऊंगा।
हनुमत बोले -"युद्ध कर बातों का क्या काज ?
इन्द्रजालिए, खेल ले इन्द्रजाल सब आज।।
यदि तुझको कुछ बन पड़े नहीं तो अभी पिता को बुलवाले ।
क्यों खड़ा हुआ मुँह तकता है ? अपने सब कर्तब दिखलाले ।
तेरा - मेरा रण ही क्या है ? मेैं तुझको खेल खिलाता हँं।
तू मेघनाद कहलाता है, मैं रामदास कहलाता हू
तू इंदजीत छलवाला है, मैं' कामजीत बलवाला ह।
तू दीपक है, मैंहँ मश्ाल रविकुल-रवि का उजियाला हू।
बिगड उठा यह बात सृन, लंकाधीशकुमार ।
ब्रह्म अस्त्र लेकर कहा - अच्छा, रोक प्रहार ।|
मझको तो तुझे बांधना है , अतएव बांध ले जाऊंगा ।
सौ दो सौ नहीं सहस्त्रों ही कर्तब अपने दिखलाऊंगा।
तू निश्चय ही है महाबीर, तेरा वीरत्व मानता
ले फेंक हा हं ब्रह्मफास, इसमें अब तुझे बाधाता हूं।
कहा अंजनीलाल ने - "पूर्ण हुआ संग्राम ।
बन्धन है यह धर्म का, बल का अब क्या काम ?
यह ब्रह्म-अस्त्र, यह ब्रह्मफाँस, यह ब्रह्मवान ब्रह्मा का है।
में इसे काट सकता हूं पर सम्मान ध्यान ब्रह्मा का है।।
जिन रामचंद्र जगदीश्वर को सुर, नर मुनि निशदिन रटते हैं।
जिनका लेते 'ही नाम तुरत सारे भवबन्धन, कटते हैं।
उनके जन को यह बन्धान क्या ? पर प्रशन धर्म का है इसमें।
अतएव नाथ के कार्य हेत - यह अनुचर बंधाता ढेै इसमें।।
इतना कह कर बंध गए स्वय, वृक्षों के डाले छोड दिए।
बँधते बँधते भी कपिवर ने बीसों -के 'मस्तक तोड दिए।
लंकेशवर की सभा में पहुंचे जभी कपीश ।
क्रोधित होकर उसी क्षण बोल उठा दसशीश ।।
"तू कौन ? कहाँ से आया है? कछ अपनी बात बता बनरे।
उद्यान उजाडा क्यों मेरा ? क्या कारण था ? बतला बनरे ।।
लंका के राजा का तने क्या नाम कान से सुनानहीं।
तू इतना ढीठ निरंकुश है - मेरे प्रताप सेडरा नहीं।।
मारा है अक्षकुवर मेरा तो 1 तेरा क्यों न सहार करू -
तूही न्यायी बनकर कहदे, तुझसे कैसा व्यवहार करूँ।।
ब्रह्मफाँस से मुक्त हो, बोले कपि सविवेक
उत्तर कैसे एक दू जब हेै प्रश्न अनेक।।
दशमुख की प्रश्न- पुस्तिका के पन्ने क्रम-क्रम से लेता हँ।
पहला जो पूछा सर्वप्रथाम उसका ही उत्तर देता हँ।
सच्चिदानन्द सर्वदानन्द बल - बुद्धि ज्ञान - सागर है जो।
रघुवंश शिरोमणि राघवेन्द्र रघुकुल नायक रघुवर है जो।।
जो उत्पति स्थिति प्रलयरूप, पालक - पोषक - संहारक हैं।।
इच्छा पर जिनकी विधि - हरि हर संसार कार्य - परिचालक है।।
जो दशरथ अजिरबिहारी हैं, कहलाते रघुकुल भूषण हैं ।
रीझी थीं जिन पर शर्पणखा, हारे जिनसे खरदृषण हैं।
फिर और ध्यान 'दे लो, जिनकी सीता को हरकर लाए हो।
मैं उन्हीं राम का सेवक तुम जिनसे बैर बढ़ाए हो।।
अब सुनिए, लंका आया था माता का पता लगाने को ।
इतने में भृख लगी ऐसी हो गया विवश फल खाने को ।।
सुधि तुमन नली पाहुने की, निश्चर कुल में अभाव है यह।
फल खाकर पेड़ तोड़ता है, बानर का तो स्वभाव है यह ।।
भगवान जीम लेते हैं जब - तब भक्त प्रसादी पाते हैं।
इस कारण भोजन से पहले - निज प्रभ को भोग लगाते हैं।।
मैंने भी श्रीरामार्पण कर उन वृक्षों के फल खाएहैं ।
तुम उस प्रसाद के पात्र नथे इस कारण तोड गिराए हैं
अक्षय-वध का उत्तर यह है सबको अपना तन प्यारा है ।
उसने जबमुझको मारा तो मैने भी उसको मारा है।।
अब मेरी कछ प्ार्थना, सुनिए 'देकर ध्यान
बिना कहे बनती नहीं, कहना पड़ा निदान ।
सीता माँ को लंका में रख- तुम भारी भूल कर रहेहो ।
जीवन में अपयश अर्जन कर - बिन आई मृत्युमर रहे हो।
सब ' पीछे से पछताते हैं जो हैं मदान्ध प्रभुता वाले ।
सन्नकट आ रहा प्रलयकाल, सोते हेै क्यों लंका वाले ?
है यही उचित शत्रुता ' छोड़ लौटाओ सीता माता को ।
श्रीकोशलेन्द्र की छाया में फैलाओ राज प्रतिष्ठा को।।
रावण बोला - व्यर्थ का यह वितान मत तान ।
चोर और बरजोर हो -करता नीति बखान ।
है धाक धरनि से गगन तलक रचना 'समस्त मुझ ही में हैं।
आज्ञाकारी हैं सूर्य-चंद्र सब उदय अस्त मुझ ही में हैं।
मेरी त्योरी के चढ़ते ही त्रैलोक्य नाचने लगते हैं।
ग्रह, काल, सुरेश, कुबेर, वरुण मेरे घर पानी भरते हैं।
आती है बड़ी हँसी मुझको यह ऊटपटॉग बात 'सुनकर -
उस अधम तपस्वी बच्चे को किस भाँति बखाना चुन-चुनकर =
ना समझे किस घमण्ड में है ? स्वामी को अपने समझाले।
उस बानरवाले तपसी से - क्याडर जाएँ लंकावाले ?
हुए अंजनीलाल के लाल के लाल तुरंत ही नैन
भाव दबाकर क्रोघ का - बोले ऐसे बैना
तूने जो 'अधम' कहा, इसे कब उनकी महिमा घटती है।
कितनी ही फेंको धाल किन्तु सूरज तक नहीं पहंचती है।।
आगया मृत्यु का दिन समीप, उसने हीं तुझ घमाया है ।
कहना सुनना दे 1 व्यर्थ सभी, तूतो सचमुच बौराया है।।
मेरा मेरा जो बकता है, यह कछ भी काम न आएगा -
तब मुट्ठी बाँधे आया थाा, अब हाथा पसारे जाएगा।।
श्रीरामचन्द्र का दास बना तो देव-वघूटी निरखोंगी
अन्यथा, मरेगा जब मदान्ध - 'मक्खियाँ लाश पर भिनकेंगी।।
दशकन्धर को विष लगा - यह हितकर उपदेश
क्रोध युक्त होकर दिया इस प्रकार आदेश।।
हे राजसभा के सचिववरों, बनरा सचमुच उन्मादी है ।
सीधा सादा सा लगता है, वास्तव में बड़ा विवादी है।।
निश्चय ही बल पर फूला ढे उन दोनों तपसी बच्चों के।
सिर इसका अभी काट डालो सामने ' मेरी इन आँखों के।।
खंगों को खींच उठे खलगण, चाहा कपि का संहार करे।
भालों की नोकों पै रखलें फिर वाणों की बौछार करे।।
दैवयोग से आगए तुरत विभीषणराय
बोल उठे - "'हो रहा है यह देश अन्याय
हे भाई ? कछ सोचो समझो, सर्वत्र क्षमाढ्रतों 'को।
ऐसा न करो जग धिक्कारे - लंकापति की कर्तुतों को।।
फिर राजसभा हेै यह राजन अन्याय न यहॉँ कीजिएगा
देना ही है . यदि दंड इसे तो अवसर देखा दीजिएगा ।।
अब तो सब कहनेलगे -''यही, यही है न्याय'।
बोल उठा रावण - "करो तो फिर अन्य उपाय ।।
वे पँछे पँछ घुमा कपि ने उद्यान उजाड़ा सारा है ।
अतएव निपूछा करो इसे, अब यह आदेश हमारा है।।
घी और तेल से वस्त्र भिगो बधवाउ पूछ में बानर की -
फिर कर प्रचण्ड प्रज्चलित अग्न लगवाउ पँछ में वानर की।।
जब-जली पूँछ से जाएगा'तो स्वामी को भड़काएगा ।
लडने के लिए तपसियों को अति शीघ्र यहाँले आएगा।
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आज्ञा सुन लंकेश की हंसे बली हनुमान
"यही पूँछ तुझ दुष्ट का हर लेगी अभिमान ।
शारद माँ तो कर चकी काम अब में कछ कर दिखलाऊगा
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तिगनी का नाच नचा इसको, सब इसकी अकड़ भुलाऊंगा।।
राजाज्ञा-वश आज्ञाकारी आज्ञा का पालन करते थो ।
घर-घर से आ-अनेक कपड़े उस एक पूछपर बँधते थे।।
लंका मं अदभुत कौतक था, - बूढ़े बच्चे सब हँसते थे।
जब पवनपुत्र अंजनीलाल अपनी यह लीला करते थे।।
वे वस्त्र लगाते जाते थो यह पँछ बढ़ाते जाते थे।
पुर भर के कपड़ें लगा दिए पर छोर न उसका पाते थे।।
घी तेल काम आया इतना बाकी न बचा छोंकन तक को।
कपड़े का ऐसा अकाल हुआ बच रहा न जरा कफन तक को ।।
बच्चे बूढ़े, तरूण सब बोल विविध विध बोल
खििलवाड़े करने लगे बजा - बजा के ढोल।।
अन्धों को सूझी नहीं सुख में दख 'की लाग ?
नगर घुमा कपि पूँछ में तुरत लगादी आग?
बूढ़े बूढे जो कहते हैं, आती वह बात यहाँपर है।
खॉसी सब रोगों की जड़ हैतो हंसी लड़ाई का घर है।।
श्री रामचन्द्र की महिमा को लंका के पामर क्या जाने।
बजरंगबली की लीला को मतवाले निश्चर ' क्या जाने 2
रजनी के जाते ही जैसे - हो उदित अरुण मार्तण्ड -उठे।
त्यों आग पूछ में लगते ही हनुमत हो परम प्रचण्ड उठे।।
अट्टाहास कर ढुर्गपर पहच पवनकुमार -
पृथ्वी से आकाश तक व्यापा शब्द अपार।।
लंका में बिजली सी चमकी घन सा धननननन घोर हुआ ।
आकार बढ़ा जब आधी सातो हा-हा चारों ओर हुआ।।
काँपे कच्छप दहले पन्नग, खिसके दिकपति वह क्रान्ति हुई ।
महिगगन हिले, गिरि धरणि धँसे अतिप्रबल प्रलयसी भ्रान्तिहुई।
चल पडी हवाऐ 'उनन्चास' तर टूट-टूटकर गिरते थे।
आकाश-धारातल एक हुआ अंजनीलाल यो बढ़ते थे।।
बढ़े हुए आकार में रहे कछ समय वीर ।
दीर्घकिया फिर पूँछ को लघु कर लिया शरीर।
चढ़कर उन कनक कँगूरों को कलशों को ढानेलगे बली।
फिर एक ठौर ' पर बैठ गए लॉगूल घुमाने लगे बली।।
हरि के द्रोही निश्चरगण को करनी का स्वाद चखाते थे।
प्रत्येक दिशा में घूम घूम - जलतों को और जलाते थे।
साँय साँय बढ़ने लगा ज्वाला का विस्तार ।
धाँय - धाँय जलने लगा असुरों का घर द्वार ।।
कोठों में धक-धक आग लगी, नर नारी व्याकल फिरते थे ।
चेती प्रचण्ड चण्डी ऐसी- गृह खण्ड खण्ड ही गिरते थे।।
जब ऊपर को लपटें उटठी चलता रथ रूका दिवाकर का।
'सारा त्रिकट गिरि भबक उठा जल लगा खौलने सागर का।।
पति को पत्नी, बेटे को माँ, अग्रज को अनुज बुलाते थे ।
लका नगरी टे नर, नारी सब हाहाकार मचाते थ्ो ।
हाहाकार निहार यह - गरज उठा दशमाथ ।
होंठ काटकर दाँत से मींजे दोनों हाथ।।
बलवानों को बलहीन समझ भृकुटी कराल करली अपनी ।
फिर आँख उठाई गगन ओर पुतली विशाल करली अपनी।।
क्रोधान्वित नेत्र दशानन के जैसे ही ऊपर उठते हैं ।
उडुगण, यम, इन्दर, कबेर, वरूण, रवि, शशि के छक्के छटते हैं।
वह बिजली थी उन आँखों में अम्बर पर घिर आए बादल ।
कड़कड़ सा भीषण शब्द हुआ जल अँधाधुन्ध लाए बादल।।
संकेतमात्र ' से ' काम हुआ, आयोजन 'होतो ऐसाहो ।
यदि श्ासन हो तो ऐसा हो, अनुशासन हो' तो ऐसा हो।।
दुर्दिन में होता नहीं कोई सिद्ध उपाय।
'देता है प्रतिकूल फल सीधा भी व्यवसाय ।
ईश्वर की माया अदभुत है, होनी का खेल निराला है।
भगवान राम ही जब रूठे, तब कौन बचाने वाला है।।
जिस समय अग्नि में जल पहँचा तो फल विपरीत लगा फलने।
घी का सा काम किया जल ने, वह आग लगी दूनी जलने।।
माना आकाशी झरने से पावक की धार झररहीथी।
या उधर अशोक वाटिका में तप्तात्मा काम कर रही थी।
बालों को खोल हुए सिया कहती थीं लज्जा जाय नहीं।
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ज्वाला मैया मेरे सुत पर देखना आच कछ आये नहीं।।
यह देखा प्रकृति का चमत्कार अंजनीलाल हर्षा उदठे।
हनुमत को जब हसते देखा रावण राजा खिसिया उटठे।।
बोले - ''क्या जाता रहा मेरा शासनकाल ?
बन्दीगृह से काल को लाओ अभी निकाल ।
ओ काल, कहा तू बैठा है? कछ कार्य नहीं कर सकता है।
लंका में आग लगी रही है, तू खड़ा खड़ा मुह तकता है?
है विपत्काल अतिकाल न कर औ शीष्र झपटकर बाहर को।
मेैं आज्ञा तुझको देता h भक्षण करले इस बानर को।।
जिस भाँति मदारी के भय से कपि नाना कर्तब करते हैं।
त्यों ही प्रताप से रावण के यम और काल भी डरते हैं।
अति कुपित देख दशकन्धर को कम्पित सा हो वह काल गया।
प्रिय प्रलयकाल की भाँंति झपट बजरंगी पर तत्काल गया।।
कहकर 'जय रघराज ' की बोले अंजनीलाल -
तुझको ही संसार में कहते हैं क्या काल ?
लू लोक-जीत, तू भूवन जीत जगजीत बखाना जाता है।
पर यह शरीर है रामदास जो कालजीत कहलाता है ।
मैं महाकाल हं अरे काल, तुझ कराल को विकराल हूँ मैं ।
जिसके अधीन है शक्ति तेरी, उस 'महाशक्ति का लाल हूँ में ।
यह कह झट
झपटे पकडा -उस कऋूर काल को क्षण भर में।
ज्यों बालकाल में ले छलाग था धारा दिवाकर की कर में ।।
त्रिभुवन में हाहाकार " हुआ, हिल गया इन्द्रपर ब्रह्मासन ।
कैलाश शिखर पर डोल गया - कैलाशनाथ का योगासन ।
इन्द्रादिक सब 'देवता हो अत्यन्त उदास
आए करने प्रार्शना - महावीर के पास।।
"बजरंगबली हो जाउ शान्त सुरगण सब विनय कर रहे हैं।
प्राकतिक खेल मिट जाएगा, इस कारण देवडर रहे हैं।।
लका को फंको क्षार करो, कंचन क कोठे तोड़ी तुम।
पर वीर, हमारे आग्रह से इस समय काल को छोड़ो तुम ।।
छोड़ दिया हनुमान ने अपने कर से काल ।
देखा दशानन ओर फिर - गर्जे आँख निकाल ।।
इतने में लंका को देखा'तो वह अत्यन्त चमकती थी।
ज्वाला ज्यों बढ़ती जाती थी त्यों कंचन ज्योति दमकती थी।
आंखो में खटका स्वर्ण तेज सोचा पश्चिम लपट का है।
जा पहुँचे तभी सुरंगों में - देखा कोई मुर्दा लटका है।
नीचे सिर, ऊपर पग उसके सांकल से जकडी बाँहें थी।
फिर देखा मुर्दा जिन्दा है। धीमी धीमी कछ आहे थीं।।
कर मुक्त उसे बजरंगी ने 'भय तजो और हो शान्त' कहा
तब सावधान होकर उसने अपना ' सारा वृतान्त कहा ।।
धन्य आपको आपने जीवन किया प्रदान।
नाम शनैश्चर दास का सुनिए दयानिधान ।।
मैं अपना फल बतलाने को दशमुख के सम्मुख आया था
"आगई साढ़़ेसाती ' तुझपर ' यह मैंने उसे बताया थाा ।।
सुनते ही वह तो भबक उठा आँखों को मुझपर लाल किया ।
'पहले तू भोग साढेसाती'" यह कह बन्दी तत्काल किया।
अब तुमने जो उपकार किया उसका है प्रत्यपकार नहीं।
कुछ सेवा लो आभारी से'तो अधिक रहेगा भार नहीं।।
यह सुनकर बोले महावीर - ’'यदि सचमुच तुम्हीं शनैश्चर हो।
तो आओ थोड़ा काम करो, जिसका प्रभाव लंका पर हो।।
इस चमक-दमक की नगरी पर कछ अपनी दृष्टि फिराओ तुम
सचमुच है दशा तुम्हारी तो कंचन को लोंह बनाओ तुम।।
दृष्टि शनैश्चर पर पड़ी छाया तिमिर अपार ।
लका काली पड़ गई, गर्जे पवनकुमार ।।
यो उलट-पुलट पुर दहन किया मद चूर कर दिया रावण का।
सम्पर्ण नगर को फूंक दिया घर छोड़ा एक विभीषण का।
सोने को भस्म बनाकर यों कुछ-कछ अलसाने लगे बली।
कूदे तत्काल समुद्र मध्य, निज पूछ बुझाने लगे बली।।
पूछ बुझा श्रम दूर कर ले छोटा आकार।
पहुंचे माता के निकट फिर श्रीवायुकुमार ।
बोल अब चित उचटता है। अतएव विदा करिएगा माँ।
फिर हाथ कृपा से इस सर पर चलती बिरियाँ धरिएगा माँ।
प्रभु ने जैसे मुन्दरी दी थी ें चिन्ह मात भी निज कर से।
सन्देश कहें जो कहना है कह दूँगा सब श्री रघुवर से।।
इन वचनों से मात को हुआ पूर्ण आल्हाद।
दिया पुत्र हनुमान को आशीर्वाद प्रसाद।।
बोली लो मेरी चड़ामणि, उनके चरणों मे रखादेना ।
कर' जोर ओर ' से मेरी फिर इस भाँंति निवेदन कर देना।।
कर्तव्य समझ कर 'वे अपना मेरा संकट सम्बरण करें।
जो बाण जयन्ता पर छोड़ा वह कहाँ गया। फिर ग्रहण करें।
यदि एक मास के भीतरही प्रभु आकर नहीं छुडाएँगे
-
तो कह देना
जतला देना, फिर मुझे न जीती पाएगे ।
बलबीर, उधर तुम जाते हो, क्या पता इधर क्या होना है।
सान्त्वना मिली थी कछ तुमसे, फिर वही रात ढिन सेना है ।
पर क्या करिए, परवशता है। इस कारण धीर धार रही हँ।
छाती पर पत्थर सा रखकर मेैं तुमको विदा कर रही हँ।
ढाढस देकर शान्त कर समझाकर बह बार।
विदा हुए आशीस ले - श्री अंजनीकुमार ।।
चलते चलते ऐसे गर्जे फट गए कलेजे असुरों के।
वह प्रलय मेघ सा शब्द हुआ गिर गए गर्भ निश्चरियों के।।
सुन अट्टाहस का, विकट शब्द पृथ्वी, पहाड़ तक डोल उठे ।
पहचान घोष बजरंगी का इस पार कीशगण बोल उठे -
हलचल यह अवलोक कर बानरदल था दंग ।
'जय राघव' कहते - उधर आते थे बजरंग ।
इस पार जभी आए कपिवर, कपिगण में हर्ष अपार हुआ।
सम्मान हुआ, सत्कार हुआ, उपचार हुआ, जयकार हुआ।।
सब उन्हें घेरकर बैठ गए, उनकी लाँगूल चूमते थे ।
'सुन-सुनकर लंका दहन कथा हो होकर मग्न झूमते थे।।
खा मधावन के मधुर फल, करते हर्षोल्लास -
'जय राघव 'करते हुए आए सब प्रभ के पास।।
एक एक - से हृदय लग मिले मैथिलीकान्त -
जामवन्त ने कर दिया वर्णन सब वृतान्त ।।
बोले - "हे नाथ, विजय पाईं इन श्रीचरणों ही केबल से ।
फल आया है उस बिरवे में सींचा था जिसे क्पा-जल से।।
सौ योजन का सागर लाँघा, बैरी के घर भी नाम किया।
जीवन प्रदान कर हम सबको हनुमत
पूरा काम किया ।।
जामवन्त की बात सुन-पुलक करुणागार ।
वीर अंजनीलाल से भेंटे भुजा पसार ।।
"हे महाबली, हे महावीर, बल पर तेरे गविंत हुं मं।
इस कृति के बदले में क्या दूं? कुछ वस्तुनहीं लज्जित हूँमैं।
हो सकता नहीं उऋण तुझसे, इस अवसर यही कहूंगा मैं।
जब तक पथ्वी - आकाश रहे बस तेरा ऋणी रहूगा मैं।ी
अब यह बतलाओ वैदेही, किस भाँति वहाँ पर रहती है?
कैसे निज जीवन रक्षा कर, अन्याय असुर का सहती है ?
यह सुनकर हनुमान ने कहा जोड़कर हाथ-
"सीता माता '"की कथा करुण कथा है नाथा ।।
सिंहिनी कटहरे में जैसे, या रसना जैसे दाँतों में ।
वैसे ही है वे सतवन्ती उन रजनीचर मदमातों में।।
या जिस प्रकार हो फणि में मणि, अथवा हो कमल पत्र जल में।
ऐसेही रहती मात वहा, जिस भाँति चन्दरिका बादल में।ा
चलने के समय कहा मुझसे - सब मेरी व्यथा सुना देना।
छोड़ा जो बाण जयन्ता पर, उसकी भी याद ढिला 'देना ।।
अपराध हुआ है क्या मुझसे? जो मुझे बिसारे बैठे हैं।
'वे प्रणतपाल कहलाकर ' क्यों अपना प्रण हारे बैठे हैं।।
दिन रात काल के मुख में हँ पर प्राणन हाय निकलते हैं।
दर्शन के प्यासे नैना यह - जीवन को रोके रहते है।।
सधि नहीं महीने भर में ली रघराई ने आकर मेरी -
तो तन तज आत्मा लोटेगी उन चरणों में जाकर' मेरी।।
चूड़ामणि चलते समय दिया, स्वामी यह चिन्ह लीजिएगा
ढुखभरी कथा वैदेही की कब तलक कहा तक सुनिएगा ?
यह सुनते ही अधिक फिर विकल हुए रघुवीर ।
A.
क्लेश हुआ अति चित्त को बहा दगों से नीर।।
बोले - "हा । ऐसी पतिव्रता ऐसे संकट के मुख में है।
जिसका मुझसा पति जीवित है वह पत्नी इतनी दख में है।।
हो कुश काथरी सेज उसकी। महलों का जीवन जिसका है।
करनी का लिखा नहीं मिटता होनी में चारा किसका है?
हनमत बोले -''नाथ के हैंअति उच्च विचार ।
पर सेवक की भी विनय, सुनें दया भंडार ।।
दख उसको होता ढे जग में. जो इन चरणों की शरण नहो।
है उसी ठौर दख या संकट जिस ठौर प्रभु -स्मरण न हो।
माता को दख संकट कैसा ? निशदिन वे नाम सुमरती हैं।
मन मन्दिर में रघुराई a साक्षात उन्हीं का करती ढैं।
है विरहज्वाल का कष्ट जहाँ, अन्तरछवि की नर्मी भी है।
इस जग का है व्यवहार यही - सर्दी भी है गर्मी भी है।
दूसरे बात कितनी सी है ? रण-भेरी बजने दें स्वामी।
लंका पर धावा करने को कपि सेना बढ़ने दें' स्वामी ।
उठकर राघव ने कहा धन्य वीर हनुमान
तेरी गति - मति योग्यता हो किस भाँति बखान ।
तुझसा उपकारी और नहीं सुर, नर मुनि सकल चराचर में ।
बलवीर हुआ तू अमत नीर विरही जीवन के तरुवर में।।
अब और विशेष कहें हम क्यातू अब से प्राण हमारा है।
श्री भरत शत्रुघ्न लक्ष्मण से सीता से बढ़कर ' प्यारा है।।
यह कहते कहते पूलकित प्रभु नयनों का नीर रोकते थे।
टकटकी बाँधकर बार - बार हनुमत की ओर देखते थे
देख अवस्था नाथ की हनुमत हुए अधीर।
हूक मार चरणों गिरे - कहकर जय रघुवीर ।।
थी दोनों ओर प्रेम नंगा, कपिदल भी जिसमें नहाता था।
स्वामी सेवक का मिलन 'देख त्रिभुवन मंडल पुलकाता था।।
प्रभु लगे उठाने हनुमत को, वे हिले नहीं उठना कैसा ?
चरणों में जब गड़ गया चित्त टलना कैसा हटना कैसा ?
शपथ दिला तब भक्त को खींच लिया निज ओर ।
आसन 'दे अपने निकट बोल अवधाकिशोर [
इस प्रकार बोले वचन जब प्रभु करूणाऐन
उन्हीं स्वरों में कहे तब हनुमत ने कुछ बैन।
एवमस्तु प्रभ ने कहा जन इच्छा अनुकूल।
बजी गगन में ढन्ढुभी, लगे बरसने फूल ।।
मित्र मंडली में जभी पहँचे पवनकुमार।
लिपट लिपटकर कीशगण भेटे बारम्बार।।
नल बोला - सच बात तो यह है, हे हनुमान।
दिया सभी साथियों को तुमने जीवन दान॥।
यदि लौट यहाँ आते हम सब सीता माँ की सुधि लिए बिना
तो प्राणदंड देते सुकण्ठ, होते न शान्त, यह किए बिना।।
कारण वे प्रथाम कह चुक थे. असफल होकर यदि आओगे।
तो पहले से कह रखता हू- सब दण्ड मृत्यु का पाओगे।।
इसी द्रष्टि से फिर यही कहता ह हनुमान।
दिया सभी साथियों को तुमने जीवन दान ।।
कहा नील ने हमी पर किया नहीं उपकार ।
हैं सुकण्ठ भी मानते इनका यह आभार।
कपिपति को रघुपति से यदि यह अवसर पर नहीं मिला देते ।
तो' बालिरज कबका उनको ' सीधा ' यमलोक पठा देते।।
इस कारण मैं यह कहता हुँ, यह दुखी जनों के त्राता हैं।
उस अशोक वाटिका में बढ़े और - हनुमान ।
यदि ठीक समय पर तरुवर से मुद्रिका गिराते नहीं वहा र
तो उन बैदेही माता को जीवित तक पाते नहीं वहां।
अतएव सिद्ध हो जाता है - संकटमोचन यह अदभुत हैं ।
कपि क्या, कपिपति क्या, सीता के जीवनदाता मारुतसुत हैं।
अंगद बोले -"किया है प्रभुतक का कल्याण ।
यह कहना तो धृष्टता, दिए उन्हें भी प्राण।
पर इतना तो कह देंगे हम - उनका भी कार्य सँभाला है।
सीता की सुधि लाकर उनके जीवन में जीवन डाला है।
तरत्र सारा ह याला,"कानी काने का जोसल है।
ही इनमें निज बल है, फिर रामकृपा का भी बल है -
प्रातकाल सुग्रीव से बोले रघुकुलनाथ -
रण तो अब अनिवार्य है निश्चरगण के साथ।
हम आर्यदेश के वासी हैं निज प्रण "पूरा करना होगा -
सीतोद्धार के साथ साथा सब भामि भार हरना होगा।।
है बलवीरों, है रणवीरों पग आगे ही धारना होगा ।।
सत्यता न्याय मर्यादा पर कटना होगा, मरना होगा
रामाज्ञा सुन चतर्दिश गरज उठे बलवन्त ।
एकत्रित सुग्रीव ने कपिदल किया अनन्त ।।
है बात न यहाँ करोड़़ों की गिनती अरबों खरबों की है।
लहरावलि सी टीड्डीदल सी सेना भालू बनरों की है।।
थे अति प्रचण्ड दुर्दण्ड सुभट जीवटवाले जीदार सभी ।
गम्भीर ' सभी रणधीर सभी बलवीर भूधाराकारसभी।।
किलकार मारकर कीशकटक सागर केतट पर जाता था।
आकाश धूल-धूसरित हुआ दिनकर न दूष्टि में आता था।
मुखरित हो उठा मेदिनी तल खलदल में खलबल हलचल है।
जयकार विश्व में गूंज गया, हर्षायमान सुरमण्डल है।
घर में आजाय एक बानरतो घर वाले घबराते 'हैं ।
लंका में कैसी बीतेगी, जब इतने चढ़कर जाते हैं ?
( इति )