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सागर तट - कपिदल सहित ठहरे सीताकान्त ।
अब जो कछ बीता उधर - सुनिए वह वृतान्त ।।
जिस दिन से लंकानगर जला गए बजरंग ।
हुए राक्षसदलों के रंग पूर्ण बदरंग
महारानी मन्दोदरी - हो अत्यंत उदास -
रो उट्ठी एकान्त में - पति चरणों के पास।।


हे प्राणनाथा, प्रजानाश, हे भमण्डल के भूप प्रभो -
'मेरी आँखों में घम रहा - अब घोर प्रलय का रूप, प्रभो।।
हनुमत से जिनके पायक हैं, वे कैंसे मारे जायेंगे?
तुम लड़के जिन्हें समझते हो -वे लडके तुम्हें हरायेंगे।
'कसमय में सन्धि उचित ही है" - यह कथन प्रवीण नपों का है।
औरों को लेखुद भी डूबे, यह मार्ग महामखों का है।।

वह कार्य सदा ही अच्छा है - जो मेल और मिल्लत में हो ।
आगे तो वह ही होता है लिक्खा जो कुछ किस्मत में हो।।
लंका यह अपनी बनी रहे क्या काम हमें फिर झगड़ों से ।
बस यही जीत ढै। यही विजय, करिएगा सुलह तपसियों से।।


सुनकर रानी के वचन, बोला तडप सुरारि।
रहने दे उपदेश यह - ओ कम हिम्मत नारि ।।
वह शूर नहीं वह कायर है - जो रण में डटकर हट जाएँ।
वह मर्द नहीं, नामर्दे हैं - जो कहकर बात पलट जाएँ।


गंगाजल उल्टी तरफ बहे या पश्चिम ्े सूरज निकले
हो सकता नहीं कभी भी यह - लंका का नाथ राय बदले।
जिसके मांझी नौ सिखिए हैं - वह बेडा औद्यटघाट सदा '
जिसने सलाह ली ओछों से - उसका घर बारहबाट सदा।।
उस बानर
वाले तपसी से क्या मेरी प्रभुताई कम है ?
दूगा [न कदापि जानकी को, जबतक मेरे दम में दम हैं।
उधर उसी दिन जुड़़ गया एक बड़ा दर्बार ।
राजमंत्रियों में किया उसने प्रकट विचार-
'"लंका के वीरों, रणधीरों, बोलो क्या' राय तुम्हारी है ।
बैरी सागर क पार खाड़ा करता अपनी तैयारी है।
हे सहायको, सेनापतियों, संगठित भली विधि हो जाओ
जिस तरह शत्रुदल हो परास्त, बस उसी मार्ग को अपनाओ।।


दर्बारी कहनेलगे - "'कौन बड़ी यह बात ?
मृगराजों के सामने, मृग की कहाँ बिसात ?


दो बालक ढें।! छोटे-छोटे कछ भलुए हैं कछ बनरे हैं।

हम लंकावालों के आगे - सब भुनगे हैं, सब मछरे हैं
अपने जो चने - चबेने हैं उनका सोचे उपाय ही क्या
राजाधिराज आनन्द करें इस रण में भला राय ही क्या?

 

कहा विभीषण ने तभी -हाय !अनर्थ |!अकाज !
इस मुह देखी बात ने - गिरा दिया है राज ।।


निश्चय यह विष की बँंदे हैं-जो मीठी मीठी बतियाँ हैं।
यह 'जीहाँ जीहाँ की रायें कागज की तीर कमनियाँ डैं।।
कहते हैं ठकुरसुहाती जो - ठाकुर का दिल, खुश करने को ।
भगवान उन्हें करदे समाप्त वह सब जीते हैं मरने को।।
पुरुषों में जो पुरुषोत्तम हैं - बालक उनको ठहराया है।


रणधीर 'वीर बानरदल को - भुनगा, मच्छर बतलाया ' है।।
इस मति पर पत्थार पड़ जाए- इस 'मुह पर बिजली टूट पड़े।।
वह राज सुरक्षित हो कैसे, जिसके सचिवों में फूट पड़े?
भाई, धीरज धर - सुनो, अब कुछ मेरी बात ।
ऐसे चिकने मत बनों - ज्यों कदली केपात |l
तुम पंडित हो, तुम शासक हो, तुम राजाओं के राजा हो।
शोभायमान 'है तुम्हं वही - जो नीति, धर्म मर्यादा हो।।
अपनेही हाशों पैरों में जब आप कुल्हाड़ी मारी है।
'तो अब लकड़ी की खङगों से रण की किसलिए तैयारी है?
खुद ही सीता को हर लाए, खुद हीयह बैर बढ़ाया है ।
खुद ' ही भारत को छेडा है, वह सोता सिंह जगाया है।।
तुम उनसे नहीं काल ही से इस समय जझते हो भाई।
पहले तो कूदे ज्वाला में- अब राय पूछते हो भाई ।।
जो कुछ कर चुके- कर चुके तुम, अब सोच समझकर पाँव धरो ।
जो चली गई वह चली गईं, जो रही उसी की बात करो।।
जड से ही रार मिटादो यह अर्पण कर उनकी सीता को ।
रघुकुलपति 'से मित्रता बढ़ा - बलवान बनाओ लंका को।।


शक्ति रूप हैं जानकी, जगदम्बा जग मात।
उन्हें त्रास दे अन्त मं- कुशल नहीं है भ्रात ।।

भाई की यह राय सुन बिगड़ उठा दशशीस ।
अरुण वरण लोचन हुए, फडक उठीं भुजबीस ।


बोला - "ब् मौन विभीषण हो अनुचित है दण्ड सहोदर को ।
इस समय और होता कोई तो अभी काट' देता सर' को।।
दुश्मन के आगे सर झुकाय ! यह रावण का दस्तूर नहीं ।
मर जाना है मंजर मगर सीता देना मंजूर नहीं।[
घरवाला होकर घर ही को, अपमानित करा रहा है तू।


आबर छत्र सिंहासन ' की, मदटी में मिला रहाहैतू।
है कुलद्रोही, कायर कुबुद्ध, ओझल हो मेरी आंखों से।
उनको ही नीति सुना अपनी, जा मिलजा तपसी बच्चों से।।
क्या-काम इस जगह ढेै उसका, जिसने बैरी से प्यार किया ?
यह कहकर भ्रात विभीषण पर रावण ने चरण प्रहार किया ।


पकड विभीषण ने चरण. कहा - लो नमस्कार
देश निकाला भी मुझे - है सहर्ण स्वीकार।।


भाई, जबतक भाई, भाईं, भरपूर निभाई सेवा है ।
अब लात लगाई. भाईं ने -यहभी भाई की इच्छा है।।
विष और अमृत दोनों पदार्थ - यद्यपि समुद्र से निकले हैं ।
पर ' उसमें तत्व मरण के हैं इसमें जीवन देने के हैं।
होनी जब सर पर आती है' तो औंधी ही मति होती है।
तुम भटका करो कंडकडों में मैनेतो पाया मोती है।।
अपराध क्षमा करना उसके जो होकर आज कठोर चला।
लंका हो तुम्हें मुबारक - मैं श्रीरामचरण की ओर चला।।


चले विभीषण इस तरह पतजकर घर परिवार -
मन में विविध प्रकार के करते हुए विचार ।।


"मनी मन-मधकर-कंज जो, निर्मल ललित ललाम ।
निरखूंगा अब प्रेम से- वहीं चरण छविधाम ।।

 

जिन चरणों का शिव सनकादिक सुर नर मुनि ध्यान लगाते हैं।
जिन चरणों की लीला महिमा - नारद शारद नित गाते हैं।
जिन चरणों से कलिमल - नाशक निकली गंगा की धाारा हेै ।
गौतम की नारि अहिल्या को जिन चरणों ने निस्तारा है।।
जिन चरणों को अंजनीलाल - आदर 'से देखा करते हैं ।
जिन चरणों की पादुका भरत - श्रद्धा से पूजा करते हैं।
अब वह शुभघड़ी आ रहीं है - निरखूँगा उन चरणों को मैं।
सौभाग्य सूय हो रहा उदय, चूमूगा उन चरणो को ें।


ऐदिल घबराहट न ला, हसरत हो बेदार
बेअदबी कुछ हो नहीं शौक बस खबर्दार 


इतने में यह खयाल आया - सम्भव है शरण नदें राघव
दुश्मन काभाई समझ मुझे नजरों को फेरनलें राघव ।।
फिर सोचा - ''यह कछ बात नहीं क्या काम यहाँ इन झगड़ों का?
राघव से मुझ प्रयोजन क्या ? मैंतो सेवक ह चरणो का।।
उन चरणों की है आस मुझे उन चरणों को मैं पकड़ँगा।
राघव पर दूष्टि उठेगी फिर - पहले चरणों को देखंगा ।।
यदि चरण निभायेंगे न मुझे तो प्रभ से विनय करूँगा मैं ।
प्रभु ने यदि त्याग दिया तो फिर - चरणों की ओट गहूँगा मैं ।।
दोनों ही यदि फिर जाएँगे तो भी क्या मैं फिर जाऊगा ?
चरणों हीकी 'सौगन्धा मुझे चरणों पर भस्म रमाऊगा ।।
जोगी बनकर - 'माला लेकर बनबन में, अलख जगाऊगा
चरणों ध्यान लगा कर ही, रघुनायक के गुण गाऊगा।।


अपनी तामस देह पर, फिर कुछ आई ग्लानि।
फिर सोचा - "उनके निकट जाने में क्या हानि ?
अस्तु अनेक प्रकार से करते हुए विचार !
भक्त विभीषण शीघ्र ही - आए सागर पार ।
दृष्टि बानरों की पड़ी - जब इन पर तत्काल ।
गए पास सुग्रीव के - और कहा यह हाल।।

सग्रीव रामजी से बोले 'कुछ नया स्वांग है गढा हुआ L
बैरी का भ्राता आता है, गम्भीर भेद है छुपा हुआ।
रजनीचर ' सब' मायावी हैं, सीधा न समझिएगा इनको ।
उत्तर' का मार्ग बताते हैं जब जाते हैं यह दक्खिन को।l
मेरा विचार तो ऐसा है -सब स्वाद चखा दँ इसको में ।
बँधवाकर अभी बानरों से - बन्दी करवादूँं इसको मैं।
भाई को बन्दी 'समझ यहां - घबराकर आएगा रावण -
सीता माँको दे जाएगा - इसको ले जाएगा रावण ।।


जामवन्त कहने लगे -"' धीरज धरिए तात।
अपने की 'शोभित नहीं ऐसी ओछी बात ।।


जो धर्ममान् हैं, योद्धा हैं - रण में कर्तव्य चुकाते हैं ।
बैरी से कहकर - जतलाकर - यमपुर उसको पहुॅचाते हैं।
आरहा भेद लेने को यदि'तो भी हमको कुछ फिक्र नहीं।
कछ यहा भेद की नीति नहीं, कछ यहा कपट का जिक्र नहीं।
धोखे से लड़ने आया हो तो भीन बात चिन्ता की है।

श्रीलक्ष्मण जी का एक बाण - उसके सहार को काफी है।।
फिर क्यों छेडे बानर- उसको सम्भव है मिलने आया हो ?
हो सकता है वह साथ - साथ सन्देश सन्धि का लाया हो ।
अथवा रावण का क्षमापात्र - वह पास हमारे लाता हो ।
या रावण से कुछ बिगड गईं - शरणार्थी होकर आता हो।


शरणार्थी ' की बात सुन बोल उठे रघुनाथ -
"'सादर शिष्टाचार से , लाउ लिवाकर साथ ।

जो निर्मल है, जो निश्चल है, वह ही जन मुझको पाता है ।
चालाक प्रपंची, धर्त छली - कब मेरे सम्मख आता है।।
यदि सभीत शरणागत होगा, दामन में उसे ढकूँगा मेैं ।
फिर 'महापातकी भीहो तो - उसको न कदापि तजूँगा मैं
में उसका सच्चा साथी हू जो सब प्रकार से आरत है ।
मैं उसका सच्चा साथी हूँ- जो जन मेरा शरणागत है।
यदि ज्रण आ रहा है मेरी - तो अपना कर रक्खूंगा मैं ।
अपने समीप बिठलाऊँगा - लक्ष्मण जैसा समझूंगा मैं।


शरणागत पर प्रीति लख पुलकि उठे हनुमन्त ।
स्वामी स्वभाव विलोककर बोले वचन तरन्त ।।


"जय शरणागत - वत्सल रमेश, जय आरतहरणनमामि हरे ।

जय भानुवंश अवतस हंस, जय अशरण शरण नमामि हरे।।


हे नाथ आजतक याद मुझे, परिचित मैं खूब विभीषण से ।

वह प्रेमी है, अनरागी है, आया दर्शन के कारण से

निश्चय शरणागत है प्रभु की, कछ सेवा काज चाहता है।।

फिर इस आशा से भी आया - लका का राज चाहता है।।

हम सभी उसे ले आते हैंवह साथा हमारे आएगा ।

अपना 'तो महालाभ ही है - घर का भेदी मिल जाएगा।।

 

पवनतनय के वचन सुन, मुस्काए भगवान ।

'जय कृपालु कहकर चले अड्गदादि हनुमान ।।

 

घर में, वन में रिपुगण में भी - भय नहीं कही कुलभूषण को ।

स्वागत - सम्मान पर्वक सब ले आए भक्त विभीषण को।

पहले तो लखा दर ही से चारों ही ओर कीशगण को

तिर्छीं चित्तवन से ताड लिया वीरासन बैठे लक्ष्मण को।।

फिर नीची नजरों से देखा - कोशलकिशोर के चरणों को।

ऐड़ी तलवों को, पन्जों को उँगलियों, नखों रेखाओं को।।

फिर आख उठाकर कुछ ऊपर देखा उस कदली जघा को।

फिर वक्षस्थल, आजानुबाहु फिर जटाजूट, फिर ग्रीवा को।।

फिर एक द्रष्टि गहरी डाली - भरपर जमाया आँखों को।

प्रति अंग-अंग प्रति रोम-रोम देखा अगणित ब्रह्माण्डों को।

फिर कुछ आगे बढ़कर देखा राजीवनयन की चितवन को ।

टकटकी बाॉधाकर फिर देखाश्रीरामचन्द्र चंद्रानन को।।

फिर समीप जाकर हूक मार गद्गद् पुलकायमान तन से।

कर जोड़ सामने खड़ा हुआ बोला श्रीरघुकुलनन्दन से।।

 

विनती कर प्रभूचरण में डाल दिया निज माथ -

'शरणागत की लाज अब रखलें रघुकुलनाथ।"

 

अचरज में बानर-भालु हुए - जब देखी दशा विभीषण की ।

पुलका उटठे श्रीरामचन्द्र, हुचकी भर आई लक्ष्मण की।

 

गदगद् थे हनुमत जामवन्त कपिपति को कृछ लज्जा आई।

अपने हाशों पर उठा उसे - लिपटे सहर्ष श्रीरघुराई ।।

 


यथायोग्य भेटे सभी - भालू-कीश-समुदाय ।
फिर आसन दे पास में बोले श्रीरघुराय
कहिये लंकेश ! कशल से हैं? घर में भी सब प्रसन्नता है।
बतलाय मुझे मैं प्रस्तुत हँ' क्य इच्छा है? क्या आज्ञा है ?
तुम ज्ञानवान सज्जन होकर लंका में कैसे रहते हो ?
किस भांति धर्म की रक्षा कर, अत्याचारों को सहते हो ?
कहता हूँ सखा भाव से मैं, सब हाल कहो अपने मन का।
मेरा ही ऐसा ढे सच्चा साथी ढ सज्जन का।।
स्वभाव जो सच्चा न समदशी है, वह मुझे प्राण से प्यारा है ।
वह ही मुझसे मिल सकता हेै जिसने अपनापन मारा है।।


मधुर वचन सुन राम के हुआ पूर्ण आनन्द ।
भक्त विभीषण ने कहा - सुनिए रघुकुलचन्द ।

वह दास सदा बड़भागी है - जो प्रभुपद का अनुगामी हो ।
वह जन निष्कंटक - निर्भय ह जिसका रघुकुल सा स्वामी हो।।
मढ मोह काम या क्रोध लोभ, उस समय हृदय से हटते हैं।
जब रघराई ईले धनुषवाण  भक्तों के चित में बसते हैं।।
माया में फसा हुआ प्राणी - तब तक पाता विश्राम नहीं
जब तक निष्काम शुद्ध मन से, मुख से कहता श्रीराम नहीं।
जो बात कान से सुनता था, वह आज आँख से देखी है।
'होती है वहीं प्रताप -1 वद्धि मर्यादा जहाँ धर्म की है।।
निश्चरकुल में पैदा होकर अब तलक बहुत भरमाया हँ।
रघुनायक, मेरी बाह गहो, मैं शरण आपकी आया हू।


नरपुडगव, नरके सरी, नरनायक, नरनाह ।
आज विभीषण दीन है प्रभुके हाथ निबाह I
धन-धाम छुटा परिवार छटा इसकी न मुझे कुछ चिन्ता है।
कछ ध्यान बीच में और हुआ उसकी भी अब न लालसा है।।



अब तो जन यही चाहता नe जन गणनायक के पास रहे।
इन चरणों ही में पड़ा रहे, इन चरणों ही का दास रहे।।


अब आगे जैसा हुआ - सुनिए वह धार ध्यान।
कपिपति से, लंकेश से बोले कृपानिधान ।|


"हे किष्किन्धापति, लंकापति, बतलाओ अब क्या करना है ?
उस निश्चरपति दशकन्धर से - किस भाँति लड़ा्ड लड़ना है?
इस सो योजन के सागर को किस तरह पार कर सकते हैं?2
क्या किसी प्रकार, किसी विधि से, हम पुल तैयार कर सकते हैं ?


प्रथम विभीषण ने कहा - सुनिए करुणागार ।
सदा धर्म की जय रहे, होगा बेड़ा पार।


वानरसेना जब अगणित है तो चिन्ता ही क्या पुल की है।
उद्योगी-वीरों को जग में क ठिनार्ड नहीं कहीं भी है।।
संकोच यहीं है सागर यह अत्यन्त पूज्य हेै रघुकुल का।
इसलिए विनीत भाव ही से माँगिए मार्ग इससे पुल का।


लषणलाल क्रोधित हुए सुनकर ऐसी राय
'शीश नवा बोले तुरत, वे छोटे रघुराय।।

'जो कार्य शीघ्र ही करना है, होगा न विनय की बातों से।
घी नहीं निकलता भा्ड जी. सीधी या खडी उँगलियों से।।
चढ जाय धनुष पर बाण अभी तो उसका गर्व हरण होगा।
फिर सागर या कि महासागर, आरत हो चरण शरण होगा।।"'


"'शान्त ! शान्त ! हो अनुजवर '" बोले श्रीरघुवीर !
"ऐसा ही होगा मगर धरे रहो कुछ धीर।।'
इतना कहकर सिन्धुतट बैठे विनय निमित्त।
सुनिए अब पिछली कथा - सावधान कर चित्त।।


लंका से चल रामादल में जिस समय विभीषण आएथे ।
पीछे से भेद जानने को - रावण ने दूत पठाए थे।।
वानराकार में शुक-सारण, इस जगह
घूमते फिरते थे।
t
श्रीराम - विभीषण मिलन देख - सानन्द झूमते फिरते थे।।
व्यवहार यहा का 'देख-देख यह दोनों भी जब भक्त हुए ।
>
घर की, तन की सुधि भूल गए, उन्मत्त हुए, अनुरक्त हुए।।
हो गए प्रकट खुल, गया कपट, कपियों ने चट पहचान लिया -
झटके दे - दे महि पर पटका, जब गुप्त दूत अनुमान लिया।।


"नाक-कान काटो अभी 'बोले कपि दो तीन
'"राम-लषण' ' की दे उठे - तभी दुहाईं दीन ।


श्रीलषणलाल के कान पडा, वह करुणाक्रन्दन दूतों का ।
बुलवाकर अपने पास वहीं - खुलवाया बन्धन दूतों का।
पहले 'तो समाचार पछा, फिर दोनों को स्वतन्त्रतादी।
फिर थोडा सा कछ सोच समझ रावण के नाम पत्रिका दी।।
"ले जाउ हमारी चिट्ठी यह - दशकन्धर को दिखला देना ।
फिर कुछ सन्देश जुबानी भी - अभिमानी को समझा देना।।


नास्तिकता, चोरी-कलह, नशा और पर नारि।
कहना - यह वस्तुएं वंश विनाशनहारि

 

आँखों के रहत अन्धा है, जो बीज जहर का बोता है ।
चोरी से हरकर परनारी. अब रण में सम्मुख होता है।।
इस उल्टी मत ' के कारण ही लंका की सत्यानाशी है ।
यह बारम्बार जता देना - जानकी जान की प्यासी है।।


चिट्ठी लेकर ' दूतवे चले - शीघ्र अत्यन्त [
रावण के दरबार में प्रस्तुत हुए तुरन्त ।।
"शुक, सारण, आगए क्या? बोल उठा दशभाल ।
'किस प्रबन्ध में हैं वहाँ कौशल्या के लाल?


पहले तो सब वृतान्त कहो उस बुद्धि विहीन विभीषण का -
जो'देश जाति का द्रोही ढेै। बागी भाई है रावण का।।
फिर उन लड़कों की बात कहो जो निज प्राणों पर खेले हैं।
फिर जिसने लंकादहन किया- उस जैसे कितने बनरे हैं ?


सारण बोला - "है वहाँ हर्ष व्याप्त सर्वत्र
लाए हैं हम साथ में लक्ष्मण जी का पत्रI


पहले तो दिया रामजी ने लंका का राज्य विभीषण को -
फिर हम दोनों को जब समझा तो आया क्रोध कीशगण को।।
लक्ष्मणजी को आ गयी दया हमने जिस समय ढुहाइ दी।
मुख से भी कुछ संदेश कहा, चिट्ठी भी लिखी, विदाई दी।।
हे नाथ, राम तो अदभुत हैं क्या कहें हृदय खो गया वहीं।
जिन - जिन अंगो पर दृष्टि गई, मन लुभा लुभाकर रहा वही।
चरणों की छवि देखे बनती वर्णन में तनिक न आती है।
कमलों पर दौड़ दृष्टि भ्रमरी - बस, बार - बार ही जाती है।।
श्री रघुकुलभूषण मुस्काकर - लंका की ओर हेरते थे।
शोभायमान था धनुषवाण - हाथों में उसे फेरते थे।।


ख शिख - सुन्दरता भरे हैं कोशल के लाल -
शोभित जिनकी देह पर, धूलि और तरुछाल ।

श्री हाराज, अबतक तो थे, खघुराई की चर्चा में हम
अब उनके दल बल का वर्णन करते हैं, भरी सभा में हम ।।
जिस ओर देखिए दृष्टि उठा अगणित ही भालू बानर हैं।
दलबद्ध सभी, रणमत्त सभी, विकराल, कराल भयंकर हैं।
सुग्रीव, नील नल, जाम्बुवन्त हनुमान, मयन्द द्विविद, अंगद ।
धाम्राक्ष, केसरी, गय, गवाक्ष दधिगाल, शरभ, शरभंग, परद।।
अगणित कपि गर्जन-तर्जन कर दहलाते व्योमधरा को हैं।
कर देंगे क्षण में खंड-खंड यो देख रहे लंका को हैं।


नाथ कहाँ तक हम कहें उनकी कथा अपार ?
दे देखा इस पार को कहते थे किलकार -


"कर देंगे छिन्न - भिन्न खलदल, भेजेगे यमपुर रावण को।
बह छत्रमुकुट, वह सिंहासन दे देंगे भक्त विभीषण को।।
श्रीराम, न आज्ञा देते हैं अन्यथा अभी दिखलादें हम ।
सेना समेत दशकन्धर को दल डाले धूल मिलादें हम।
आसुरी सभा को उलट पलट चोरी का स्वाद चखादें हम ।।
सारी नगरी ळो चौपट कर - सागर के मध्य बहादे हम ।।
जगदम्बा, जगज्जया, जननी, सीता माँको ले आएं हम।
एकासन ' राजें राम - सिया, पूजा कर पुष्प चढ़ाएं हम।।
इस भाँति हरणकर - भूमि भार सुर नर मुनि को कर 'दें निर्भय
तब गूज उठे त्रिभुवन में ध्वनि - श्री राजारामचन्द्र की जय ॥।


सुनकर दूतों की कथा, लषण - पत्रिका बाँच ।
हसकर रावण ने कहा - "लिया शत्रुबल जाँच।


बानर भालू की चिन्ता क्या ? वह तो असुरो का भोजन हैं।
रावण रे लडने आते हं लड़कों का यही लड़कपन
देखो'तो छोटे तपसी को कैसी बकवादें करता है ।
मृगशावक - शशि के छूने को चौकड़़ी छलाँगे भरता है?


हाश बाँध शक ने कहा - " सुनिए निश्चरराज
रुठ रहा है आपसे - राज और यह ताज ।।

कछ होनहार दे लंका में - यह हमें दिखाई पड़ती है ।
जो भली बात भी नाथ तुम्हं - विष जैसी कडवी लगती है।।
सशय की रही बात ही क्या, जब स्वयं देख हम आए हैं ।
निश्चय ही अपनी ताकत से - वे डयोढ़े और सवाए हैं।
सीता को दे कीजिए सन्धि - जग में यदि जीवित रहना है ।
अन्यथा, हमें यह दीख रहा - उनसे लडना खूद मरना है।।
हम जिसे तपसिया कहते हैं - वह योगेश्वर हैं भूतल में।
तोड़ेंगे हमें खिलौना - सा- जब खेलेंगे युद्धस्थल में।


रक्त वर्ण रावण हुआ नेत्र 'होगए लाल ।
लात मार दर्वार से - दोनों दिए निकाल।।


यह भी आए रघुबीर ' शरण, सब बीती ' बतलाईं अपनी।
रघराई की अनुकम्पा से दोनों न गति पाई अपनी।।
शुक सारण ऋषि थे- शाप विवश लंका में रहे अज्ञ होकर।
अब शाप मिटा आश्रम पहच करुणानिधि के कृतज्ञ होकर


विनय न सागर ने सनी - बीत गए दिन तीन
तब उद्ठे प्रभु ऊबकर, रह न सके आसीन ।।


बोले - "भय बिन होती न प्रीत, इस कारण बाण चलाना है।
फिर बाण कौन सा ? अग्नबाण - पानी में आग लगाना है।।
यह कहकर बाण चढ़ाया जब - धन्वा का जब टंकार हआ ।
जलचरदल सादा अकलाया, सागर में हाहाकार हुआ।।
जल के भीतर जब आग उठी - लहरों के ऊपर झाग उठे।
फटी वह ज्वालामुखी वहाँ, पानी' के सोते जाग उठे।
ऊपर से प्रभु की क्रोधानल, नीचे से भड़की बड़वानल ।
दो अनलों में जब आया खल, तब फैली सागर में खलभल।।


अब तो कंचनथाल में, मणिगण भरे अनूप।
आया शरण कृपालु के धर मानव का रूप।

चरणों पर प्रथाम नजर डाली, फिर हीरे 'मोती नजर किए ।
फिर हाथ जोड कर खड़ा रहा, लज्जावश नीची नजर किए।
फिर बोला - क्षमा क्षमा ! राघव, तुम कृपासिन्धु हो दानी हो।
जल ने जलने की ठहरा दी, आबरू न पानी पानी हो।।


सिन्धा वचन सुन, हँस पडे- श्रीरघुराज उदार
कहा - बताओं कपि कटक किस प्रकार हो पार ?


शीस नवा उसने कहा - सूनिए करुणागार -
जो आज्ञा हो आपकी - वही मुझे स्वीकार ।l


प्रभु के प्रताप से क्षणभर में शोषण हो सकता हेै मेरा।
पर इतना ध्यान रहे भगवन् गौरव भी मिटता ढे मेरा ।।



क्यों नहीं कार्य वह किया जाय, जिसकी युग-युग तक याद रहे।
हो जाय विजय भी राघव की, सागर की भी मर्याद रहे।।
नल-नील बड़े वरदानी हैं, वे जल पर सेतु बनाएँगे ।
अपने हाथो' से रक्खोगे तोे पत्थार भी तैराएँगे ।।
फिर मदद करेगा सागर भी - मन में यह छुपी भावना है ।
पुल बंधे विजय हो लंका पर - मेरी भी यही कामना है।
यह अग्निवाण उन पर छोड़ो - जी खल हैं मेरे उत्तर में।
आरम्भ सेतु का कार्य करो - अत्यन्त शीघ्र शुभ अवसर में।ा


तीर छोड़ प्रभु तभी हरी सिन्धू की पीर।
सागर' गदगद होगया हर्णाये रघुवीर ।।


सुग्रीव बोल उठे तुरन्त - ''यह ही अवसर मुहूर्त का है।
नल, नील, सेतु आरम्भ करो शुभ कार्य शीघ्र ही अच्छा है।
यह सुनते ही कपि सेना में आनन्दपूर्ण जयकार हआ।
पाषाण शीघ्र ही लाने को बानर मण्डल तैयार हआ।।
चिकने, चौड़े, उजले, सुडौल, जो ढले कुदरती साँचों में ।
कपिगण चुन-चुन ऐसे पत्थार लाते थे बातों-बातों में ।।
ले-लेकर नाम रामजी का नल नील उठाते थे पत्थार ।
वह चमत्कार था हाथों में जल पर'तर जाते थे पत्थर ।l
मिस्त्रियों और मजदूरों में उत्साह कार्य का दूनाथा।
प्राचीन कला का भारत की, वह पुल बेजोड़ नमूना था।।

सेतु बाँधने में सभी करते थे उद्योग ।
रघुराईं ने भी दिया, लीलावश सहयोग।।


एकान्त जगह में आगे बढ़- जल के ऊपर रक्खा पत्थर ।
रघुवर के कर से छुटते ही- सागर में डूब गया पत्थर ।।

हनुमत कछ निकट उपस्थित थे, हस पड़े देखकर घटना यह।
मन ही मन सोच रहे थो प्रभु- पाषाण क्यों नहीं तैरा यह।।

आगे आकर भक्त 'ने कह ही दिया तुरन्त ।
"क्यों डूबा पाषाण यह - बतलादूँ भगवन्त।


यह महिमा नाश राम की है- जल पर पत्थर तैराते हैं ।
उस राम-नाम से राम स्वयं क्यों अपनी होड़ लगाते हैं ?
फिर भी कु३ मन की कहता हूं अपराध क्षा सरकार करें।
दो पुष्प चरण में रखता हूँ यदि रघुराईं स्वीकार करें।
जो कर कमलों में बना रहा निश्चय वह बना रहा भगवन्।
इन हाथों से जो छट गया सचमुच वह डूब गया भगवन्।


ठीक समय पर होगया सुन्दर सेतु तैयार ।
मुस्काकर कहने लगे - तब श्रीकरुणागार ।।


जो कार्य नहीं हो सकता ढे सम्राटों से भी बरसों में ।
है साधुवाद ' वीरों तुमको, वह कर दिखलाया दिवसों में।
अच्छा अब मेरी इच्छा है- सस्थापन हो शिवशंकरका।
लंका पर चढ़ने के पहले आराधान हो शिवशंकर का।
रण के देवता त्रिलोचन ढें पहले हम उन्हें मनाएग
मृत्युंजय का आवाहन ' कर राक्षसगण पर जय पाएँगे।।
असुरों के रखवाले हैंतो - अपने भी रक्षक हैंशंकर '
है न्याय जहा पर सर्वप्रशम, उस जगह सहायक हैं शकर ।।
में उनका हं, वह मेरे हैं, हम दोनों क्षीर सर्करा हैं।
आराध्यदेव "या इष्टदेव - मेरे'तो भोले बाबा हैं ।।


इतना सुनते ही हुआ फिर दल में जयकार।
अपने हाथों राम ने - की शिव मर्ति तैयार ।।

'संस्थापन आवाहन, अर्चन
विधि सहित हुआ विश्वेश्वर का

सागर'तट बना रामद्वारा इस भाँति धाम सिद्धेश्वर 'का।
प्रभु बोले - शकर में मुझमें, द लेशमात्र भी भेद नहीं T
जो जन अद्वत उपासक हैं - होता दै उनको खेद नहीं।।
जैसे सब नदियों का पानी - सागर ही मेंतो आता है ।
त्यों ही सब देवों का पूजन - परमात्मा ही में जाता है।
इतने में कहा पवनसुत ने - "अब द्ैत समाप्त तमाम हुआ।
इसलिए आज से आगेको -"शिवराम "" एक ही नाम हुआ।।
यह सुनकर फिर जयकार हुआ, ध्वनि गूँज उठी श्रीहरिहर की
तुम भी अब 'राधेश्याम कहो - जय राम और रामेश्वर की।।
(翰)

 

 

श्रीगरु चरन सरोज रज निज मन मकर सधारि।

बरनउँ रघबर बिमल जस जो दायक फल चारि
द्धिहीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार ।

बल बुधि बिद्या देह मोहिं हरहु कलेस बिकार ।


१ चौपार्ड ।


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहँ लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी। कमति निवार" सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कंचित केसा।।
हाथा बज् औ ध्वजा बिराजै। काँधे माँज जनेऊ साजै।।
शंकर सवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।
सक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे।।
लाय सँजीवनि लखन जियाए । श्रीरघुबीर हरषि उर लाए।।
रघूपति कीन्हीं बहुत बड़ार्ई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।
सनकादिक बह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कबेर दिगपाल जहाँ ते। कपी कोबिद कहि सकौं कहाँ ते।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा।।
तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।
प्रभु मुद्रिका मेलि मख माहीं जलधि लॉँधि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखावारे।होतन आज्ञा बिनुपैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।।
आपनो तेज सम्हारो आपै। तीनौं लोक हाँक ते काँपे।।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकटतें हनुमान छड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोहि अमित जीवन फल पावै।।
चारो जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा ।।
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन 'राम दुलारे।।

अष्ट सिदधि नौ निधि के दाता । अस बर दीन्ह जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।
अंत काल रघुबर पुर जाईं। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुखा करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत ' बलबीरा।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कपा करहु गुरुदेव कीनाईं।।
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदयमहँ डेरा।।


पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप।!