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तुझ बिनु कवनु हमारा ॥

तेरे बिना हमारा और कौन (सहारा) है?


मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥

हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे मेरे प्राणों के आसरे प्रभू !


सरब सुखा मै तुझ ते पाए मेरे ठाकुर अगह अतोले ॥

सारे सुख मैंने तुझसे ही पाए हैं, हे मेरे अथाह और अडोल ठाकुर !


बरनि न साकउ तुमरे रंगा गुण निधान सुखदाते ॥

हे गुणों के खजाने प्रभू ! हे सुख देने वाले प्रभू ! तुम्हारे रंग (खेल) वर्णन नहीं किये जा सकते


अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥

हे अपहुँच प्रभू ! हे इन्द्रियों की पहुँच से परे प्रभू ! हे अविनाशी प्रभू ! पूरे गुरू के द्वारा ही तेरे साथ गहरी सांझ डल सकती है।


भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥

(जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं वे गुरू की शरण पड़ कर) जब से (अपने अंदर से अहंकार दूर करते हैं)~ गुरू उनकी भटकना व डर दूर करके उन्हें पवित्र जीवन वाला बना देता है।


जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति 

साध-संगति में (गुरू के) दर्शन की बरकति से उनके जनम मरण के चक्कर का सहम खत्म हो जाता है।


चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥

हे दास नानक ! (कह–) मैं (गुरू के) चरण धो के गुरू की सेवा करता हूँ। मैं (गुरू से) लाखों बार कुर्बान जाता हूँ~


जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक पृअ संगि मिरीआ ॥

क्योंकि उस (गुरू) की कृपा से ही इस संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं और प्रीतम प्रभू (के चरणों) में जुड़ सकते हैं।