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《अव्वल तो सब को   दर्  पे बुलाते नही है. 
पर जिसको बुलाते है खाली लौटाते नहीं है
 के अकीदत से झुका देता है जो भी सर को इस दर पे 
फिर उसके सर से अपना हाथ हटाते ही नहीं है 》

《सतगुर जिनके करीब होते है वो बडे खुशनसीब होते है
और जिनको बक्शे ये नाम की दौलत 
कौन कहता है के गरीब होते है  》

《और पड़े जिन पर इनकी सीधी नजर
भाग उनके बड़े अजीब ऐते है 
और इनकी नजरों से गिर गए जो मी 
वो बड़े बदनसीब होते हैं》
 
《 हर मर्ज की दवा है उनके  हाथों  में 
सतगुर आप ऐसे हबीब होते है
 दिल से जो भी दिवाने तेरे दाता
 सदा उनके करीब होते है》

भजन

ये बात आम हो गई है जमाने मे
 कोई कमी नही दाता तेरे खजाने मै 

 किसी को जहां की हुकुमत मिली है
 और किसी को जहां का खजाना मिला  है 
और मैं अपने  मुकद्दर पे क्यो न कुरबान जाऊँ
 मुझे दाता तेरा आसताना मिला है

 

 

《 मेरी आरजू है इतनी के मेरे साथ 
रहना जब डोले मेरी कश्ती मेरी बाह थाम लेना
 क्यो की जिसका भी पकड़ा है आपने हाथ वो रहा न बेसहारा 
और दरिया में दूब कर भी उसे जिल गया किनारा
कोई कमी नही दाता तेरे खजाने में》


 इसीलिए तो मंगतो की भीड है दर पे 
मेरे "हुजुर" झिझकते नही लुटाने में

《मैं ये सुनकर तेरे दरबार चला आया हुँ 
तुम किसी हाल में खाली नहीं जाने देते 
इससे पहले ही करते हो ....
दिल की फरियाद को लब तक नहीं आने देते》

मेरे हुजुर" झिझकते नहीं -

 

ये करम अपने मुरीदो पर करते है सदा 
से खासियत है दाता के आसताने में
कोई कमी नही दाता तेरे ख़ज़ाने में
 

 

ये झूम-झूम के दिवाने सभी बोल रहे 
जो इनकी आँखों में मस्ती है नहीं महखाने में  
《जिसे पी के सारी दुनिया तेरे दर पे झूमती है"
 मेरे साकिया बता दे वो शराब कौन सी है》

 जो इनकी आखो में मस्ती नहीं महकाने में 
कोई कमी नही

 

दाता सुन लेते है दिल से लगी    सदाओ को
 ये वक्त जाया नहीं करते किसी बहाने से


《रंग खादिम को रंगा दाता तूने अपना
रंगते ऐसी चदी रंग तुम्हारा लेकर 
और क्या से क्या हो गए हम नाम तुम्हारा लेकर》

आ गया मेरे होठो पे "नामए दलीप"
दूर दिल...
मैने मुशकिल...
मेरे वाता..

रंग खादिम को रंगा दाता तूने अपना 
में ये तेरी जर्रा नवाजी है निभाने मैं 
कोई कमी नही दाता तेरे खजाने में